गलत-सही पर मुँह से बोलो- कमल बाजपेई

●जीवन नया नहीं दे सकते, 
●क्या हक है जीवन लेने की।
●भीड़ इकट्ठी हो कर जाहिल ,
●हत्या कर दी साधु जनो की।
●बेरहमी से मारा पीटा 
●रक्षक ही थे उनके भक्षक 
●पकड़ भीड़ के बीच दे दिया 
●किंकर्तव्य बने सब रक्षक।
●क्या हो रहा हमारे घर मे ,
●विश्व ठगा सा देखे ऐसे।
●यह संतो का देश हमारा ,
●कर्म दनुज-दानव के जैसे।
●है कलंक लगा माथे पर ,
●शर्म-सार है आज मनुजता।
●इतने निष्ठुर कैसे हो गए? 
●कहाँ गयी वह सत्य-अहिंसा।
●जब भी कही विकृत घटना हो ,
●धृतराष्ट्र आँखें अब खोलो।
●नहीं नपुंसक द्रोण, भीष्म यदि ,
●गलत सही पर मुँह से बोलो।।
       ●Written by-कमल बाजपेई●

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