उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के बेलन नहर खण्ड, प्रयागराज के अधिशासी अभियंता श्री सुरेश कुमार यादव इंजीनियर होकर संस्कृत भाषा और संस्कृत के विभिन्न ग्रन्थों में गहरी रुचि लेते हैं । विभिन्न देशों खासकर जर्मनी में संस्कृत भाषा के अध्ययन को बढ़ावा वैज्ञानिक खोजों के लिए तेजी से किया जा रहा है । विभिन्न वैज्ञानिक एवं मेडिकल साइंस की खोजों के आधार के बारे में सिंचाई विभाग में ही लखनऊ में अधीक्षण अभियन्ता के पद पर कार्यरत श्री संजय त्रिपाठी का भी अध्ययन गहरा हैं। मिर्जापुर में तैनाती के दौरान श्री त्रिपाठी से विज्ञान और धर्म के एक दूसरे के पूरक विषय पर लम्बी वार्ता होती रही, जो मेरी रुचि में परिवर्तित होती गई ।
पिता श्री हिंदी गौरव डॉ भवदेव के लेखन की भी यही दृष्टि थी। वैदिक काल के ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों के साथ जोड़ने के कारण उन्हें लेखन के विभिन्न उच्चस्तरीय सम्मानों से विभूषित हुए । उनकी दो दर्जन पुस्तकें शोध छात्रों के लिए उपयोगी हैं । ऐसे छात्रों को उनका साहित्य समय-समय पर उपलब्ध डॉ भवदेव पांडेय शोध संस्थान से किया जा रहा है ।
ईं सुरेश कुमार यादव का प्रश्न- कोरोना की भयावहता के दौर में चमगादड़ भी चर्चा में है । इस संबंध में गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकांड के 121 दोहे की चौपाई में चमगादड़ का प्रयोग हुआ है । इसी के साथ कफ-वात-पित्त का भी उल्लेख है । सब इसे सोशल साइट पर फारवर्ड कर रहे हैं लेकिन श्री यादव की जिज्ञासा कुछ गहरी है। वे जिज्ञासु की भांति इन रहस्यों के बारे में प्रश्न करते हैं । इस सिलसिले में मेरा मत निम्नांकित है ।
राम के चरित का निष्कर्ष है उत्तरकाण्ड- मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम वनवास के बहाने पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे हैं । अरण्यकाण्ड में लक्ष्मण को पेड़-पौधों की महत्ता, जानवरों की प्रजाति, नदी-पर्वतों, सूर्य, चन्द्रमा, मौसम आदि की जानकारी दे रहे हैं । कभी वे मनुष्य से लेकर पशुओं के चिकित्सक नजर आते हैं तो कभी कृषि एवं पर्यावरण वैज्ञानिक, कभी सिंचाई अभियन्ता, कभी निर्माण अभियन्ता के रूप में दिखते हैं । प्रदूषण के जरिए ग्लोबल वार्मिंग उत्पन्न करने वाले खर-दूषण से लेकर रावण तक का विनाश करते हैं। सामाजिक तानाबाना बुनने के क्रम में नारी पीड़ा को दूर करते है । पीड़िता सबरी एवं अहल्या की खोज खबर लेते हैं । जहां हल नहीं चल पाता था और जमीन पथरीली थी उसे उपजाऊ बनाते हैं ।
पूर्णाहति-सारी मर्यादा और परिश्रम की पूर्णाहुति उत्तरकाण्ड है । इस कांड के 121 वें दोहे में गरुण जी कागभुशुंडी से प्रश्न करते हैं । प्रश्न पर गौर करने की जरूरत है । कागभुशुंडी और गरुण एक ही प्रजाति के हैं । इसी कांड में महादेव पार्वती से कहते भी हैं-खग खग ही की भाषा समझता है । गरुण जी पहले देव-दुर्लभ शारीरक स्वास्थ्य के बारे में 7 प्रश्न करते हैं । ज्ञानेंद्रियों के 7 द्वार होते हैं । शरीर के ये द्वार मज़बूत तो शत्रु या चोर अंदर नहीं जा सकेगा ।
कोरोना के संदर्भ में चमगादड़- चमगादड़ जिधर से उड़ता है तो उसके पंख से विषाणु निकलते हैं । प्रसंग यह है कि जो दूसरों की निंदा करता है वह अगले जन्म में चमगादड़ होता है । अगला जन्म का मतलब अगला पल । निंदक जहां जाएगा, चमगादर की तरह विषाणु छोड़ता रहेगा । निंदा भी एक रस है । इस रस का स्वाद लगने पर व्यक्ति किसी का अच्छा गुण नहीं देख पाता । इसी चौपाई में कौन कौन से अवगुण अपनाने से अगला जन्म(पल) क्या हो जाता है, इसमें मेढ़क और कौए से भी तुलना की गई है। कफ-वात और पित्त मन के विकारग्रस्त होने से अव्यवस्थित होता है। इसलिए गांधी जी ने भी बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो का सुझाव दिया । मन के विकृत होने से शरीर में नकारात्मकता का पिशाच जन्म लेता है और खून पी जाता है ।
सक्षिप्त- यही अंत किया जाता हैं । विषय वृहद है ।
- सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
पिता श्री हिंदी गौरव डॉ भवदेव के लेखन की भी यही दृष्टि थी। वैदिक काल के ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों के साथ जोड़ने के कारण उन्हें लेखन के विभिन्न उच्चस्तरीय सम्मानों से विभूषित हुए । उनकी दो दर्जन पुस्तकें शोध छात्रों के लिए उपयोगी हैं । ऐसे छात्रों को उनका साहित्य समय-समय पर उपलब्ध डॉ भवदेव पांडेय शोध संस्थान से किया जा रहा है ।
ईं सुरेश कुमार यादव का प्रश्न- कोरोना की भयावहता के दौर में चमगादड़ भी चर्चा में है । इस संबंध में गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकांड के 121 दोहे की चौपाई में चमगादड़ का प्रयोग हुआ है । इसी के साथ कफ-वात-पित्त का भी उल्लेख है । सब इसे सोशल साइट पर फारवर्ड कर रहे हैं लेकिन श्री यादव की जिज्ञासा कुछ गहरी है। वे जिज्ञासु की भांति इन रहस्यों के बारे में प्रश्न करते हैं । इस सिलसिले में मेरा मत निम्नांकित है ।
राम के चरित का निष्कर्ष है उत्तरकाण्ड- मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम वनवास के बहाने पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे हैं । अरण्यकाण्ड में लक्ष्मण को पेड़-पौधों की महत्ता, जानवरों की प्रजाति, नदी-पर्वतों, सूर्य, चन्द्रमा, मौसम आदि की जानकारी दे रहे हैं । कभी वे मनुष्य से लेकर पशुओं के चिकित्सक नजर आते हैं तो कभी कृषि एवं पर्यावरण वैज्ञानिक, कभी सिंचाई अभियन्ता, कभी निर्माण अभियन्ता के रूप में दिखते हैं । प्रदूषण के जरिए ग्लोबल वार्मिंग उत्पन्न करने वाले खर-दूषण से लेकर रावण तक का विनाश करते हैं। सामाजिक तानाबाना बुनने के क्रम में नारी पीड़ा को दूर करते है । पीड़िता सबरी एवं अहल्या की खोज खबर लेते हैं । जहां हल नहीं चल पाता था और जमीन पथरीली थी उसे उपजाऊ बनाते हैं ।
पूर्णाहति-सारी मर्यादा और परिश्रम की पूर्णाहुति उत्तरकाण्ड है । इस कांड के 121 वें दोहे में गरुण जी कागभुशुंडी से प्रश्न करते हैं । प्रश्न पर गौर करने की जरूरत है । कागभुशुंडी और गरुण एक ही प्रजाति के हैं । इसी कांड में महादेव पार्वती से कहते भी हैं-खग खग ही की भाषा समझता है । गरुण जी पहले देव-दुर्लभ शारीरक स्वास्थ्य के बारे में 7 प्रश्न करते हैं । ज्ञानेंद्रियों के 7 द्वार होते हैं । शरीर के ये द्वार मज़बूत तो शत्रु या चोर अंदर नहीं जा सकेगा ।
कोरोना के संदर्भ में चमगादड़- चमगादड़ जिधर से उड़ता है तो उसके पंख से विषाणु निकलते हैं । प्रसंग यह है कि जो दूसरों की निंदा करता है वह अगले जन्म में चमगादड़ होता है । अगला जन्म का मतलब अगला पल । निंदक जहां जाएगा, चमगादर की तरह विषाणु छोड़ता रहेगा । निंदा भी एक रस है । इस रस का स्वाद लगने पर व्यक्ति किसी का अच्छा गुण नहीं देख पाता । इसी चौपाई में कौन कौन से अवगुण अपनाने से अगला जन्म(पल) क्या हो जाता है, इसमें मेढ़क और कौए से भी तुलना की गई है। कफ-वात और पित्त मन के विकारग्रस्त होने से अव्यवस्थित होता है। इसलिए गांधी जी ने भी बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो का सुझाव दिया । मन के विकृत होने से शरीर में नकारात्मकता का पिशाच जन्म लेता है और खून पी जाता है ।
सक्षिप्त- यही अंत किया जाता हैं । विषय वृहद है ।
- सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।


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