कैसे बनें पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी हिन्दी जगत के 'निराला" जानिएं पूरी कहानी
शिवाकांत अवस्थी
महराजगंज/रायबरेली: छायावाद के प्रमुख स्तम्भ महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। जिनका ऋणी आज भी समाज है। वह कैसे हिन्दी साहित्य के निराला बने इसके पीछे भी उनकी पत्नी सहित ससुराल डलमऊ और वहां के सुन्दर गंगा घाटों की कहानी है।उनके पात्र समाज के असली चेहरे है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपनी रचनाओं को गढ़ा, लेकिन कम ही लोग जानते है कि, इनमें ज्यातदर पात्र ऐसे स्थान से आते है जहां से निराला का हिन्दी से लगाव हुआ और बांग्लाभाषी सूर्यकांत हिन्दी के "निराला" बन गए। रायबरेली से 30 किमी की दूरी पर बसा डलमऊ कस्बा निराला की ऐसी साहित्यिक यात्रा का साथी रहा है, जिसकी शुरुआत ही यहीं से होती है। यहीं से हिन्दी जगत के अप्रतिम निराला का अभ्युदय हुआ।
पत्नी ने जगाया हिन्दी के प्रति लगाव
पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी बंगाल में रहते थे और हिन्दी की तुलना में उनपर बांग्ला भाषा का ज्यादा प्रभाव था। हिन्दी पर उनका ज़्यादा ध्यान भी नहीं था। लेकिन एक ऐसा वाक्या हुआ जिसने पंडित सूर्यकांत को प्रेरित किया और वह हिन्दी साहित्य के निराला बन गए।
1911 में निराला का विवाह डलमऊ के पंडित दीनदयाल की बेटी मनोहरा देवी से हुआ। उस समय निराला विद्यार्थी थे और कक्षा नौ में पढ़ते थे। उनकी शिक्षा दीक्षा पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुई। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी। उनकी शिक्षा भी प्रारम्भ से ही बांग्ला में हुई थी, जिससे उनपर बांग्ला का सबसे अधिक प्रभाव था। बांग्लाभाषी निराला जब पहली बार अपनी ससुराल डलमऊ आये तो उनकी पत्नी मनोहरा देवी ने उन्हें 'श्री रामचंद्र कृपालु भजमन' सस्वर सुनाया जिसने निराला को बहुत प्रभावित किया। पत्नी से हिन्दी के भजन को सस्वर सुनकर बांग्लाभाषी सूर्यकांत का हिन्दी के प्रति लगाव शुरू हुआ। उन्होंने इसे सीखने का संकल्प किया और बिना किसी के सहायता के हिन्दी भाषा की बारीकियां सीखी और कई महत्वपूर्ण ग्रंथो का अध्ययन किया।
पत्नी के भजन ने उनके मन मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाला कि, हिन्दी की ओर वह ऐसे प्रवत्त हुए की आज भी हिन्दी साहित्य उनका ऋणी है। पत्नी के एक भजन ने पंडित सूर्यकांत को हिन्दी साहित्य का "निराला" बना दिया।
मित्रता ने भी निराला पर छोड़ी छाप
निराला आम जन के रचयिता थे, उनकी रचनाओं के पात्र उनके अपने होते थे, जिनमें उनके मित्र भी शामिल है। डलमऊ में पंडित पथवारी दीन उर्फ कुल्ली भांट उनके परम मित्र थे। जब निराला पहली बार ससुराल आये, तो डलमऊ स्टेशन से कुल्ली ही उनको लेकर आये थे। बाद में दोनों की मित्रता काफ़ी घनिष्ठ हो गई। कुल्ली कविता भी करते थे और उन्हें इतिहास तथा साहित्य की काफ़ी जानकारी थी। समाज सुधारक के रूप में वह काफी प्रगतिवादी थे। उन्होंने समाज के पिछड़े वर्ग के लिए एक विद्यालय भी खोला हुआ था। इन्ही कारणों से निराला कुल्ली से बहुत प्रभावित थे कि, उन्होंने कुल्ली भांट पर एक पूरी किताब ही लिख डाली थी। किताब में निराला लिखते है कि, 'पंडित पथवारी दीन भट्ट (कुल्ली भाट) मेरे मित्र थे। उनके परिचय के साथ मेरा भी परिचय आया है कदाचित अधिक विस्तार पा गया है'।
मित्र की कहानी के बहाने निराला ने समाज की रूढ़ियों के खिलाफ अपनी रचना में आवाज उठाई है। बाद में कुल्ली भाट की मित्रता की छाप उनकी कई रचनाओं में देखने को मिलती है।
ससुराल बना साहित्यिक साधना का केन्द्र
ससुराल होने के कारण निराला का डलमऊ आना जाना लगा रहा। गंगा किनारे के घाट उन्हें सदैव आकर्षित करते रहे। यहीं के गंगा घाट पर लिखी गई कृति 'बांधो न नावं इस ठावँ बंधु, पूछेगा सारा गाँव बंधु' उनकी कालजयी रचना है। डलमऊ के किले से संबंधित आख्यानों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने 'प्रभावती' उपन्यास लिखा। बेटी सरोज के असामयिक मौत पर इन्ही गंगा घाटों पर उन्होंने 'सरोज स्मृति' की रचना कर डाली और अपनी पीड़ा को इन शब्दों में उतारा "धन्य मैं पिता निरर्थक तेरे हित कुछ कर न सका"।
1929 में पास के ही पखरौली के जमींदार द्वारा एक गरीब लडक़ी पर किए गए अत्याचार को भी उन्होंने डलमऊ के गंगा घाट पर बैठकर अपनी लेखिनी पर उतारा और 'अलका' नामक उपन्यास की रचना कर डाली।डलमऊ के गंगा घाट और यहां के लोगों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। जोकि उनकी रचनाओं में परिलक्षित होते हैं। उनकी रचनाओं के चतुरी चमार और कुल्ली भाट इसी डलमऊ के वास्तविक पात्र है। जिनसे निराला प्रभावित थे और अपनी रचनाओं में उन्होंने उनकी आवाज को जगह दी। डलमऊ के गंगा घाट पर बैठना और गंगा दर्शन के साथ रचना उनकी नित्यकर्म था। यहीं के घाट की सीढ़ियां है जो निराला को माता की गोद का सुख देती है, और निराला इन्ही पर 'घाट का कर्ज' की रचना कर देते हैं।
निस्संदेह पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी को "निराला" बनाने में डलमऊ का सबसे बड़ा योगदान है। उनकी रचनाशीलता यही से आरंभ होकर और यहीं आकार भी लेती है। प्रेम, विरह, सुख, दुःख, विद्रोह और प्रगति सब निराला को यही से मिलते हैं।डलमऊ निराला के जीवन के साथ रचा बसा तो है ही, लेकिन उनकी साहित्यिक यात्रा के आरंभ से ही साक्षी रहा है। पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी को हिन्दी साहित्य का निराला बनाने में डलमऊ का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
शिवाकांत अवस्थी
शिवाकांत अवस्थी
महराजगंज/रायबरेली: छायावाद के प्रमुख स्तम्भ महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। जिनका ऋणी आज भी समाज है। वह कैसे हिन्दी साहित्य के निराला बने इसके पीछे भी उनकी पत्नी सहित ससुराल डलमऊ और वहां के सुन्दर गंगा घाटों की कहानी है।उनके पात्र समाज के असली चेहरे है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपनी रचनाओं को गढ़ा, लेकिन कम ही लोग जानते है कि, इनमें ज्यातदर पात्र ऐसे स्थान से आते है जहां से निराला का हिन्दी से लगाव हुआ और बांग्लाभाषी सूर्यकांत हिन्दी के "निराला" बन गए। रायबरेली से 30 किमी की दूरी पर बसा डलमऊ कस्बा निराला की ऐसी साहित्यिक यात्रा का साथी रहा है, जिसकी शुरुआत ही यहीं से होती है। यहीं से हिन्दी जगत के अप्रतिम निराला का अभ्युदय हुआ।
पत्नी ने जगाया हिन्दी के प्रति लगाव
पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी बंगाल में रहते थे और हिन्दी की तुलना में उनपर बांग्ला भाषा का ज्यादा प्रभाव था। हिन्दी पर उनका ज़्यादा ध्यान भी नहीं था। लेकिन एक ऐसा वाक्या हुआ जिसने पंडित सूर्यकांत को प्रेरित किया और वह हिन्दी साहित्य के निराला बन गए।
1911 में निराला का विवाह डलमऊ के पंडित दीनदयाल की बेटी मनोहरा देवी से हुआ। उस समय निराला विद्यार्थी थे और कक्षा नौ में पढ़ते थे। उनकी शिक्षा दीक्षा पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुई। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी। उनकी शिक्षा भी प्रारम्भ से ही बांग्ला में हुई थी, जिससे उनपर बांग्ला का सबसे अधिक प्रभाव था। बांग्लाभाषी निराला जब पहली बार अपनी ससुराल डलमऊ आये तो उनकी पत्नी मनोहरा देवी ने उन्हें 'श्री रामचंद्र कृपालु भजमन' सस्वर सुनाया जिसने निराला को बहुत प्रभावित किया। पत्नी से हिन्दी के भजन को सस्वर सुनकर बांग्लाभाषी सूर्यकांत का हिन्दी के प्रति लगाव शुरू हुआ। उन्होंने इसे सीखने का संकल्प किया और बिना किसी के सहायता के हिन्दी भाषा की बारीकियां सीखी और कई महत्वपूर्ण ग्रंथो का अध्ययन किया।
पत्नी के भजन ने उनके मन मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाला कि, हिन्दी की ओर वह ऐसे प्रवत्त हुए की आज भी हिन्दी साहित्य उनका ऋणी है। पत्नी के एक भजन ने पंडित सूर्यकांत को हिन्दी साहित्य का "निराला" बना दिया।
मित्रता ने भी निराला पर छोड़ी छाप
निराला आम जन के रचयिता थे, उनकी रचनाओं के पात्र उनके अपने होते थे, जिनमें उनके मित्र भी शामिल है। डलमऊ में पंडित पथवारी दीन उर्फ कुल्ली भांट उनके परम मित्र थे। जब निराला पहली बार ससुराल आये, तो डलमऊ स्टेशन से कुल्ली ही उनको लेकर आये थे। बाद में दोनों की मित्रता काफ़ी घनिष्ठ हो गई। कुल्ली कविता भी करते थे और उन्हें इतिहास तथा साहित्य की काफ़ी जानकारी थी। समाज सुधारक के रूप में वह काफी प्रगतिवादी थे। उन्होंने समाज के पिछड़े वर्ग के लिए एक विद्यालय भी खोला हुआ था। इन्ही कारणों से निराला कुल्ली से बहुत प्रभावित थे कि, उन्होंने कुल्ली भांट पर एक पूरी किताब ही लिख डाली थी। किताब में निराला लिखते है कि, 'पंडित पथवारी दीन भट्ट (कुल्ली भाट) मेरे मित्र थे। उनके परिचय के साथ मेरा भी परिचय आया है कदाचित अधिक विस्तार पा गया है'।
मित्र की कहानी के बहाने निराला ने समाज की रूढ़ियों के खिलाफ अपनी रचना में आवाज उठाई है। बाद में कुल्ली भाट की मित्रता की छाप उनकी कई रचनाओं में देखने को मिलती है।
ससुराल बना साहित्यिक साधना का केन्द्र
ससुराल होने के कारण निराला का डलमऊ आना जाना लगा रहा। गंगा किनारे के घाट उन्हें सदैव आकर्षित करते रहे। यहीं के गंगा घाट पर लिखी गई कृति 'बांधो न नावं इस ठावँ बंधु, पूछेगा सारा गाँव बंधु' उनकी कालजयी रचना है। डलमऊ के किले से संबंधित आख्यानों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने 'प्रभावती' उपन्यास लिखा। बेटी सरोज के असामयिक मौत पर इन्ही गंगा घाटों पर उन्होंने 'सरोज स्मृति' की रचना कर डाली और अपनी पीड़ा को इन शब्दों में उतारा "धन्य मैं पिता निरर्थक तेरे हित कुछ कर न सका"।
1929 में पास के ही पखरौली के जमींदार द्वारा एक गरीब लडक़ी पर किए गए अत्याचार को भी उन्होंने डलमऊ के गंगा घाट पर बैठकर अपनी लेखिनी पर उतारा और 'अलका' नामक उपन्यास की रचना कर डाली।डलमऊ के गंगा घाट और यहां के लोगों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। जोकि उनकी रचनाओं में परिलक्षित होते हैं। उनकी रचनाओं के चतुरी चमार और कुल्ली भाट इसी डलमऊ के वास्तविक पात्र है। जिनसे निराला प्रभावित थे और अपनी रचनाओं में उन्होंने उनकी आवाज को जगह दी। डलमऊ के गंगा घाट पर बैठना और गंगा दर्शन के साथ रचना उनकी नित्यकर्म था। यहीं के घाट की सीढ़ियां है जो निराला को माता की गोद का सुख देती है, और निराला इन्ही पर 'घाट का कर्ज' की रचना कर देते हैं।
निस्संदेह पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी को "निराला" बनाने में डलमऊ का सबसे बड़ा योगदान है। उनकी रचनाशीलता यही से आरंभ होकर और यहीं आकार भी लेती है। प्रेम, विरह, सुख, दुःख, विद्रोह और प्रगति सब निराला को यही से मिलते हैं।डलमऊ निराला के जीवन के साथ रचा बसा तो है ही, लेकिन उनकी साहित्यिक यात्रा के आरंभ से ही साक्षी रहा है। पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी को हिन्दी साहित्य का निराला बनाने में डलमऊ का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
शिवाकांत अवस्थी


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