ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया (9 मई) नारद जयंती पर विन्ध्यधाम से मंगलकामनाओं का प्रवाह-----
नकारात्मकता के दृष्टिदोष को नष्ट कर सकारात्मक-ज्ञान का प्रवाह करने वालों में प्रथम स्थान देवर्षि नारद का लिया जाता है। वैदिक काल के ऋषि नारदका जीवन को लयात्मक बनाने के रूप में वर्णित है । देवर्षि नारद का उल्लेख ब्रह्माजी के अनेक पुत्रों में शामिल है । धर्मग्रन्थों के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन, स्कंद आदि के साथ नारद को प्रजा-सृष्टि करने का आदेश दिया लेकिन लोकहित में नारद ने जब इस आदेश को स्वीकार नहीं किया तब ब्रह्माजी कुपित हो गए और उन्हें एक स्थान पर कहीं स्थिर न रहकर तीनों लोकों में विचरण करने का श्राप दे डाला । पिता ब्रह्मा के इस श्राप को नारद ने अपने ऋषित्व बल पर वरदान मान लिया तथा उठा ली वीणा और तीनों लोकों में नकारात्मकता के विषाक्तता को दूर करने के लिए भ्रमणशील हो गए । नारद के हाथ में जो वीणा है, उसका नाम ही महती है । यह नाद-सृष्टि का प्रतीक भी है । इस वीणा से यह प्रकट होता है कि इसमें कुछ विशिष्टता तो थी, जिसे लेकर वे किसी भी लोक में गए या देव-दानव किसी दरबार में गए, उनकी वीणा की तान के आगे सब उनका आदर करने के लिए बाध्य हुए हैं ।
घटना स्थल तक (,ग्राउंड जीरो), खुद जाते थे देवर्षि नारद, वास्तव में वैदिक युग से लेकर महाभारतकाल तक अनेकानेक विसंगतियों के बीच देवर्षि नारद उपस्थित दिखाई पड़ते हैं । भले आधुनिक लोकजीवन में उन्हें इधर की बात उधर करने के लिए कहा जा रहा हो लेकिन ज्ञान के अधिष्ठाता नारद ने देवपक्ष हो या दानवपक्ष, सबके सामने निडर होकर यत्र-तत्र की सिर्फ सूचनाएं नहीं दी बल्कि दृष्टि दी। वे तो ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग करते थे ।रामायण ग्रन्थ के रचयिता वाल्मीकि कवि बनने के पहले तो डाकू और लुटेरे थे । उनके सामने जो पड़ता था, कांपने लगता था लेकिन नारद तो नहीं कांपे । उनकी वीणा की झंकार से कुछ तो ऐसी हलचल हुई कि लुटेरे वाल्मीकि को उस झंकार ने अंतर्मन तक झंकझोर दिया । वे आसुरी वृत्ति त्याग कर नारायणी वृत्ति की ओर उन्मुख हो गए । पदार्थों के वाह्य आकर्षण को उलट दिया नारद ने और वाल्मीकि रामायण लिखने पर सहमत हो गए। इस सहमति का रूप वाल्मीकि के रामायण ग्रन्थ के प्रथम बालकाण्ड में दिखता है। प्रथम सर्ग में स्पष्ट दिखता है कि देवर्षि नारद शिक्षक हैं और वाल्मीकि शिष्य के रूप में श्रीराम की कथा सुनते हैं । इसके बाद वाल्मीकि का हृदय परिवर्तन क्रौंच-क्रौंची पर बहेलिए द्वारा वाण-वर्षा से हुई। उनके कंठ से गीत की धारा जब फूटी तब ब्रह्मा जी उनके पास आए और रामायण की रचना का आदेश दिया ।
सिर्फ सूचनाओं तक नहीं समाधान तक की सम्पादकीय-समाधान के प्रतीक नारद,,
देवर्षि नारद सिर्फ सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं करते बल्कि समाधान भी तलाशते हैं । ऋषि अत्रि की पत्नी अनसुइया के पातिव्रत्य की तारीफ से पार्वती, लक्ष्मी तथा सरस्वती में ईर्ष्या उत्पन्न होती है । ईर्ष्या लघुता प्रदान करती हैं । तीनों देवियों ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अनसुइया का पातिव्रत्य नष्ट करने के लिए प्रेरित किया । लेकिन नारी के सतीत्व के आगे सत-रज-तम के तीनों लोकों के प्रतीक ब्रह्मा, विष्णु और महेश बच्चे की तरह हो गए । इस कथा के लेखक देवर्षि नारद का इसमें सन्देश है कि अनर्गल किसी को नीचा दिखाने के लिए किए गए काम की क्या गति होती है ? फिर तीनों देवियों की बेचैनी को दूर करने के लिए नारद ने अनसूया के पास भेजा तथा ऋषि पत्नी अनसूया के आश्रम तक पहुंचाया । जहां जाने से तीनों महाशक्तियों का हृदय परिवर्तन हुआ । नारद सिर्फ हृदय परिवर्तन के पक्षधर दिखते हैं । 19 एवं 20 वीं शताब्दी में भी स्वामी विवेकानन्द और महात्मा गांधी तक हृदय परिवर्तन से विजय पताका फहराने के पक्षधर दिखाई पड़ते हैं ।
पीड़ित को मूक से वाचाल (बोलने की ताकत) की पत्रकारिता करते थे नारद
दर असल मनुष्य हो या शक्ति संम्पन्न देवगण, सभी को सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देने में देवर्षि नारद पीछे नहीं रहे बल्कि वे विपरीत स्थितियों की परवाह किए बिना नर को नारायण बनाने का प्रयत्न करते रहे । वीणा के माधुर्य युक्त गूंज के साथ 'नारायण, नारायण' का उद्गघोष हृदय परिवर्तन के सृजन के लिए ही होता रहा । विभिन्न प्राकृतिक संपदाओं, खनिज पदार्थों से युक्त विंध्याचल पर्वत को उद्वेलित जब कर दिया तब विन्ध्यपर्वत सूर्य की सत्ता को चुनौती देने लगा । फिर तो ब्रह्माण्ड में हलचल हो गई। गुरु आगस्तय को आना पड़ा । इस कथा में 'मूक होहि वाचाल, पंगु चढ़ई गिरिवर गहन' का भाव परिलक्षित होता है। यहां देवर्षि द्वारा विंध्यपर्वत को आत्मशक्ति का बोध कराने का यत्न स्पष्ट झलकता है । स्वस्थ सूचनाओं के साथ ज्ञान के प्रकाश से तीनों लोकों को आलोकित करने के कारण देवर्षि नारद की इतनी लोकप्रियता है कि वे जहाँ जाते हैं सभी बड़े आदर एवं अपनत्त्व से उनका पहले कुशल क्षेम पूछते हैं । नारी सौंदर्य से आक्रांत होने पर जब वे भगवान विष्णु के पास जाते हैं तो भी उनका अंतर्मन विष्णु को बाध्य नहीं करता कि वे विश्वमोहिनी से विवाह करना चाहते ही हैं । बल्कि माता सरस्वती की कृपा उनपर दिखाई पड़ती है और वे नारायण से बोलते है-'जेहिं विधि होय नाथ हित मोरा, करऊ सो दास अनुग्रह तोरा' । भगवान विष्णु को सर्वाधिकार देते हैं । जिद नहीं कि मेरा विवाह हो ही जाए । देवर्षि नारद के इन स्वरूपों पर व्यास जी मुग्ध हो गए और अपने पुत्र शुकदेव को नारद से शिक्षा ग्रहण करने का आदेश देते हैं । महाभारत ग्रन्थ के शांति पर्व के 12 अध्यायों में नारद ने सर्वप्रथम ज्ञान की महत्ता ही नहीं बल्कि उसका निरन्तर अभ्यास करते रहने पर बल दिया है । नारद का जीवन ही 'राजा स्वदेश में पूजा जाता है और विद्वान सर्वत्र' का प्रतीक है । उनकी वीणा प्रकृति के विभिन्न उपादानों नदी, पेड़, पौधों, सूरज, चाँद, सितारों आदि से निकलने वाले संगीत माधुर्य से तालमेल बैठाने का वाद्ययंत्र है । प्राचीनकाल में देवमण्डल को प्रसन्न करने के लिए संगीत विद्या का आश्रय लिया जाता था ।
प्रलोभनों से दूर रहने वाली नारद की पत्रकारिता
इस तरह नारद के जीवन को आधुनिक भौतिकतावादी युग में गहराई से समझने की जरूरत है । मनुष्य वाह्योन्मुख कामनाओं को वीणा वाद्ययंत्र की तरह उलट कर आंतरिक शांति यदि चाहता है तो नारद के ज्ञान रूपी वीणा की गूंज वाल्मीकि की तरह सुननी होगी। इस स्थिति में पूरी धरती को स्वर्ग बनने में देर नहीं लगेगा । वाद्ययंत्र का तूम्बा नीचे और खूंटी उपर होती हैं । यह तूम्बा ही मनुष्य का सिर है । जीवन में शांति के लिए अनर्गल आकांक्षाओं को उलट-पलट कर देने की जरूरत है । ऐसी स्थिति में तेजी से भागती पूरी दुनियां को पुनः स्वर्ग लोक के आनन्द से लाभान्वित हो सकती है ।।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर
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नकारात्मकता के दृष्टिदोष को नष्ट कर सकारात्मक-ज्ञान का प्रवाह करने वालों में प्रथम स्थान देवर्षि नारद का लिया जाता है। वैदिक काल के ऋषि नारदका जीवन को लयात्मक बनाने के रूप में वर्णित है । देवर्षि नारद का उल्लेख ब्रह्माजी के अनेक पुत्रों में शामिल है । धर्मग्रन्थों के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन, स्कंद आदि के साथ नारद को प्रजा-सृष्टि करने का आदेश दिया लेकिन लोकहित में नारद ने जब इस आदेश को स्वीकार नहीं किया तब ब्रह्माजी कुपित हो गए और उन्हें एक स्थान पर कहीं स्थिर न रहकर तीनों लोकों में विचरण करने का श्राप दे डाला । पिता ब्रह्मा के इस श्राप को नारद ने अपने ऋषित्व बल पर वरदान मान लिया तथा उठा ली वीणा और तीनों लोकों में नकारात्मकता के विषाक्तता को दूर करने के लिए भ्रमणशील हो गए । नारद के हाथ में जो वीणा है, उसका नाम ही महती है । यह नाद-सृष्टि का प्रतीक भी है । इस वीणा से यह प्रकट होता है कि इसमें कुछ विशिष्टता तो थी, जिसे लेकर वे किसी भी लोक में गए या देव-दानव किसी दरबार में गए, उनकी वीणा की तान के आगे सब उनका आदर करने के लिए बाध्य हुए हैं ।
घटना स्थल तक (,ग्राउंड जीरो), खुद जाते थे देवर्षि नारद, वास्तव में वैदिक युग से लेकर महाभारतकाल तक अनेकानेक विसंगतियों के बीच देवर्षि नारद उपस्थित दिखाई पड़ते हैं । भले आधुनिक लोकजीवन में उन्हें इधर की बात उधर करने के लिए कहा जा रहा हो लेकिन ज्ञान के अधिष्ठाता नारद ने देवपक्ष हो या दानवपक्ष, सबके सामने निडर होकर यत्र-तत्र की सिर्फ सूचनाएं नहीं दी बल्कि दृष्टि दी। वे तो ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग करते थे ।रामायण ग्रन्थ के रचयिता वाल्मीकि कवि बनने के पहले तो डाकू और लुटेरे थे । उनके सामने जो पड़ता था, कांपने लगता था लेकिन नारद तो नहीं कांपे । उनकी वीणा की झंकार से कुछ तो ऐसी हलचल हुई कि लुटेरे वाल्मीकि को उस झंकार ने अंतर्मन तक झंकझोर दिया । वे आसुरी वृत्ति त्याग कर नारायणी वृत्ति की ओर उन्मुख हो गए । पदार्थों के वाह्य आकर्षण को उलट दिया नारद ने और वाल्मीकि रामायण लिखने पर सहमत हो गए। इस सहमति का रूप वाल्मीकि के रामायण ग्रन्थ के प्रथम बालकाण्ड में दिखता है। प्रथम सर्ग में स्पष्ट दिखता है कि देवर्षि नारद शिक्षक हैं और वाल्मीकि शिष्य के रूप में श्रीराम की कथा सुनते हैं । इसके बाद वाल्मीकि का हृदय परिवर्तन क्रौंच-क्रौंची पर बहेलिए द्वारा वाण-वर्षा से हुई। उनके कंठ से गीत की धारा जब फूटी तब ब्रह्मा जी उनके पास आए और रामायण की रचना का आदेश दिया ।
सिर्फ सूचनाओं तक नहीं समाधान तक की सम्पादकीय-समाधान के प्रतीक नारद,,
देवर्षि नारद सिर्फ सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं करते बल्कि समाधान भी तलाशते हैं । ऋषि अत्रि की पत्नी अनसुइया के पातिव्रत्य की तारीफ से पार्वती, लक्ष्मी तथा सरस्वती में ईर्ष्या उत्पन्न होती है । ईर्ष्या लघुता प्रदान करती हैं । तीनों देवियों ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अनसुइया का पातिव्रत्य नष्ट करने के लिए प्रेरित किया । लेकिन नारी के सतीत्व के आगे सत-रज-तम के तीनों लोकों के प्रतीक ब्रह्मा, विष्णु और महेश बच्चे की तरह हो गए । इस कथा के लेखक देवर्षि नारद का इसमें सन्देश है कि अनर्गल किसी को नीचा दिखाने के लिए किए गए काम की क्या गति होती है ? फिर तीनों देवियों की बेचैनी को दूर करने के लिए नारद ने अनसूया के पास भेजा तथा ऋषि पत्नी अनसूया के आश्रम तक पहुंचाया । जहां जाने से तीनों महाशक्तियों का हृदय परिवर्तन हुआ । नारद सिर्फ हृदय परिवर्तन के पक्षधर दिखते हैं । 19 एवं 20 वीं शताब्दी में भी स्वामी विवेकानन्द और महात्मा गांधी तक हृदय परिवर्तन से विजय पताका फहराने के पक्षधर दिखाई पड़ते हैं ।
पीड़ित को मूक से वाचाल (बोलने की ताकत) की पत्रकारिता करते थे नारद
दर असल मनुष्य हो या शक्ति संम्पन्न देवगण, सभी को सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देने में देवर्षि नारद पीछे नहीं रहे बल्कि वे विपरीत स्थितियों की परवाह किए बिना नर को नारायण बनाने का प्रयत्न करते रहे । वीणा के माधुर्य युक्त गूंज के साथ 'नारायण, नारायण' का उद्गघोष हृदय परिवर्तन के सृजन के लिए ही होता रहा । विभिन्न प्राकृतिक संपदाओं, खनिज पदार्थों से युक्त विंध्याचल पर्वत को उद्वेलित जब कर दिया तब विन्ध्यपर्वत सूर्य की सत्ता को चुनौती देने लगा । फिर तो ब्रह्माण्ड में हलचल हो गई। गुरु आगस्तय को आना पड़ा । इस कथा में 'मूक होहि वाचाल, पंगु चढ़ई गिरिवर गहन' का भाव परिलक्षित होता है। यहां देवर्षि द्वारा विंध्यपर्वत को आत्मशक्ति का बोध कराने का यत्न स्पष्ट झलकता है । स्वस्थ सूचनाओं के साथ ज्ञान के प्रकाश से तीनों लोकों को आलोकित करने के कारण देवर्षि नारद की इतनी लोकप्रियता है कि वे जहाँ जाते हैं सभी बड़े आदर एवं अपनत्त्व से उनका पहले कुशल क्षेम पूछते हैं । नारी सौंदर्य से आक्रांत होने पर जब वे भगवान विष्णु के पास जाते हैं तो भी उनका अंतर्मन विष्णु को बाध्य नहीं करता कि वे विश्वमोहिनी से विवाह करना चाहते ही हैं । बल्कि माता सरस्वती की कृपा उनपर दिखाई पड़ती है और वे नारायण से बोलते है-'जेहिं विधि होय नाथ हित मोरा, करऊ सो दास अनुग्रह तोरा' । भगवान विष्णु को सर्वाधिकार देते हैं । जिद नहीं कि मेरा विवाह हो ही जाए । देवर्षि नारद के इन स्वरूपों पर व्यास जी मुग्ध हो गए और अपने पुत्र शुकदेव को नारद से शिक्षा ग्रहण करने का आदेश देते हैं । महाभारत ग्रन्थ के शांति पर्व के 12 अध्यायों में नारद ने सर्वप्रथम ज्ञान की महत्ता ही नहीं बल्कि उसका निरन्तर अभ्यास करते रहने पर बल दिया है । नारद का जीवन ही 'राजा स्वदेश में पूजा जाता है और विद्वान सर्वत्र' का प्रतीक है । उनकी वीणा प्रकृति के विभिन्न उपादानों नदी, पेड़, पौधों, सूरज, चाँद, सितारों आदि से निकलने वाले संगीत माधुर्य से तालमेल बैठाने का वाद्ययंत्र है । प्राचीनकाल में देवमण्डल को प्रसन्न करने के लिए संगीत विद्या का आश्रय लिया जाता था ।
प्रलोभनों से दूर रहने वाली नारद की पत्रकारिता
इस तरह नारद के जीवन को आधुनिक भौतिकतावादी युग में गहराई से समझने की जरूरत है । मनुष्य वाह्योन्मुख कामनाओं को वीणा वाद्ययंत्र की तरह उलट कर आंतरिक शांति यदि चाहता है तो नारद के ज्ञान रूपी वीणा की गूंज वाल्मीकि की तरह सुननी होगी। इस स्थिति में पूरी धरती को स्वर्ग बनने में देर नहीं लगेगा । वाद्ययंत्र का तूम्बा नीचे और खूंटी उपर होती हैं । यह तूम्बा ही मनुष्य का सिर है । जीवन में शांति के लिए अनर्गल आकांक्षाओं को उलट-पलट कर देने की जरूरत है । ऐसी स्थिति में तेजी से भागती पूरी दुनियां को पुनः स्वर्ग लोक के आनन्द से लाभान्वित हो सकती है ।।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर
©इस आलेख पर लेखक का स्वत्वाधिकार है । बिना अनुमति के पूरे या आंशिक लेखन का प्रयोग लेखन चोरी माना जाएगा । लेखन चोरी का पता लगाने के लिए गूगल-एप सहायक है।
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