महापुरुषों को किसी बंधन में नहीं बांधा जा सकता है, वह सम्पूर्ण समाज, मानवता, देश और विश्व की विभूति होते है।भगवान परशुराम भी किसी एक समाज के न होकर सम्पूर्ण मानवता के संवाहक है। वह शास्त्र और शस्त्र के संवाहक है तो वह शोषित वर्ग के प्रतिनधि भी जिन्होंने राजसत्ता को चुनौती दी।वह शिव की त्यागपूर्ण संस्कृति की उदघोषक है और भोग की संस्कृति के नाशक।उनका जीवन आज भी सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रासंगिक बना हुआ है।वह काल से भी परे है और सभी काल की मानवता के आदर्श भी।भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया पर हुआ था इसी लिए परशुराम जयंती इसी दिन मनाई जाती है।वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनुर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर में उच्च ग्रहों से युक्त माता रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम का प्रादुर्भाव हुआ।भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप मे वह सभी के लिए पूज्य हैं।उनके आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं।
काल से परे हैं भगवान परशुराम
भगवान परशुराम काल से परे हैं, उन्हें चिरंजीवी माना जाता है। वह किसी एक समाज के न होकर।सम्पूर्ण हिन्दू समाज के आदर्श हैं। वह किसी एक काल तक भी सीमित नही है वह हर काल और युग मे हैं। मान्यता है कि भगवान परशुराम को राम के काल मे भी देखा गया है और कृष्ण के काल मे भी।कहा जाता है कि वह कलिकाल में भी आएंगे और कल्प के अंत तक पृथ्वी पर तपस्या करेंगे। कई पौराणिक कथाओं में उन्हें सभी काल मे युक्त माना गया है,इनके अनुसार भगवान परशुराम महेंद्र गिरी पर्वत भगवान परशुराम की तपस्थली है जहां वह कल्पांत तक के लिए तपस्या रत हैं।भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठवां अवतार भी माना जाता है।उन्हें चिरकाल तक रहने वाला माना गया है।सतयुग में जब एक बार गणेश जी उन्हें शिव दर्शन से रोक दिया था तो उनपर उन्होंने परशु से प्रहार कर दिया था जिसके बाद गणेश जी एकदंत कहलाये।त्रेता युग मे उन्होंने जनक,दशरथ आदि राजाओं की लोकभावना का सम्मान किया।भगवान राम और मां सीता के स्वयंवर के साक्षी के बने।द्वापर में उन्होंने कौरव सभा मे भगवान कृष्ण के सत्य का साथ दिया और उन्हें सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया।भीष्म,द्रोण व कर्ण को भी उन्होंने शस्त्र और शास्त्र की दीक्षा दी।वह हर काल मे है उन्हें चिरंजीवी माना जाता है।वह कलिकाल में भी है।उड़ीसा के गजपति जिले में स्तिथ महेंद्र गिरी पर्वत को भगवान परशुराम का तपस्या स्थल है जहां आज भी माना जाता है कि वह तपस्यारत है और कल्पांत तक फिर समाज के लिए अवतरित होंगे।
शस्त्र और शास्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक
भगवान परशुराम शस्त्र और शास्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक है जिसकी प्रासंगिकता आज भी समाज मे है।वह आश्रमों में शास्त्र को प्रतिस्थापित तो करते ही है लेकिन उसे व्यवहार में उतारने के लिए शस्त्र भी उठाते है।इसीलिए हर काल और समय मे वह पूरी तरह से व्यवहारिक हैं।उन्होंने समाज को एक दिशा दी।उन्होंने सिद्ध किया कि शस्त्र और शास्त्र में किसी की भी उपेक्षा करने के परिणाम ठीक नही होते हैं।वह शस्त्र और शास्त्र के समन्वित शक्ति के उपयोग के संस्थापक है।वह समाज के ऐसे आदर्श महापुरुष हैं जिनकी प्रासंगिकता सदैव रही है।उन्होंने सत्य की स्थापना और असत्य को हटाने के लिए शस्त्र उठाया।वह सम्पूर्ण समाज के प्रतिनधि हैं।मनुष्य की पशुवत प्रवित्तियों के वह संहारक है।आज भी सत्य के संवर्धन और असत्य को हटाने में उनकी प्रासंगिकता महत्वपूर्ण हो जाती है।इसीलिए मान्यता है कि वह काल से परे है।जब मानव की पशुवत प्रवित्तियाँ समाज के लिए घातक हो जाती है तो शास्त्र के साथ साथ शस्त्र की भी जरूरत पड़ती है।इसी आदर्श की स्थापना के लिए भगवान परशुराम अवतरित होते हैं।भगवान राम और कृष्ण भी इसी आदर्श के संवाहक हैं।भगवान परशुराम ने इसी सत्य की स्थापना के लिए शस्त्र की भी प्रतिज्ञा की।वह शास्त्र और शस्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक हैं।सहस्त्रार्जुन के वैभव और शक्ति पर उनकी विजय इसी शस्त्र की आदर्श परम्परा को सिद्ध करती है।राज भोग के प्रति उनकी विरक्ति और शास्त्र और शस्त्र की उनकी आसक्ति केवल और केवल समाज के लिए है जो आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।
भगवान परशुराम हैं सच्चे जनप्रतिनिधि
भगवान परशुराम सही मायनों में और सच्चे जनप्रतिधि हैं।वह समानता के संवाहक है उन्होंने लोकरक्षा के लिए शस्त्र उठाया और सत्ता की शोषित और भोग की संस्कृति का नाश किया।वह शिव के उपासक है जिनके त्याग की भावना सदा समाज के लिए समर्पित रही है।भगावन परशुराम लोक रक्षा की इसी भावना के प्रवर्तक रहे है उनकी शक्ति लोक की है जिसने राज शक्ति पर विजय पाई है।वह लोक के लिए जीने वाले ऐसे आदर्श है जिनकी आवश्यकता समय समय पर हमेशा रहती है।भगवान परशुराम का आदर्श विशुद्ध समाज और लोक के लिए था,जिन्होंने सम्पूर्ण समाज के लिए राजसत्ता की विलासोन्मुखी प्रवित्तियों का नाश किया और राज सत्ता का एक आदर्श स्थापित किया।वह शैव संस्कृति के सच्चे उपासक हैं उन्होंने समानता और समभाव की शैव परम्परा की स्थापना के लिए सतत आचरण किया और समाज के लिए एक आदर्श स्थापित किया।उनका परशु समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज के लिए उठा उन्होंने शास्त्र की प्रतिस्थापन के लिए ही दुष्टों का संहार किया।भगवान परशुराम ऐसे महापुरुष है जिन्होंने त्याग और जनहित की संस्कृति को अपनाया।इसके लिए वह केवल शस्त्रों के वाचन तक ही सीमित नही रहे इसके लिए उन्होंने इसे व्यवहार में अपनाया और हर काल मे समाज को दुष्टों से मुक्ति दिलाई।पौराणिक ग्रंथों में 21 बार संहार का उल्लेख उनकी इसी निष्ठा का प्रतीक है।वह अपनी शक्ति और तपस्या का शिवत्व के लिए उपयोग करते रहे जो कि आम जन के लिए था।उनका शिवत्व महलों के वैभव और विलासिता के खिलाफ त्याग और जनता के हित में था।इसीलिए भगवान परशुराम लोकरक्षा का व्रत लेते है और त्यागपूर्ण जीवन के साथ आमजन के लिए खड़े होते है।इसीलिए वह सच्चे अर्थो में जनप्रतिधि है। भले ही उन्हें एक समाज के बंधन में बांधा जा रहा हो लेकिन वह सम्पूर्ण समाज के एक लोक प्रतिनधि हैं जो आज भी सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रासंगिक हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
काल से परे हैं भगवान परशुराम
भगवान परशुराम काल से परे हैं, उन्हें चिरंजीवी माना जाता है। वह किसी एक समाज के न होकर।सम्पूर्ण हिन्दू समाज के आदर्श हैं। वह किसी एक काल तक भी सीमित नही है वह हर काल और युग मे हैं। मान्यता है कि भगवान परशुराम को राम के काल मे भी देखा गया है और कृष्ण के काल मे भी।कहा जाता है कि वह कलिकाल में भी आएंगे और कल्प के अंत तक पृथ्वी पर तपस्या करेंगे। कई पौराणिक कथाओं में उन्हें सभी काल मे युक्त माना गया है,इनके अनुसार भगवान परशुराम महेंद्र गिरी पर्वत भगवान परशुराम की तपस्थली है जहां वह कल्पांत तक के लिए तपस्या रत हैं।भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठवां अवतार भी माना जाता है।उन्हें चिरकाल तक रहने वाला माना गया है।सतयुग में जब एक बार गणेश जी उन्हें शिव दर्शन से रोक दिया था तो उनपर उन्होंने परशु से प्रहार कर दिया था जिसके बाद गणेश जी एकदंत कहलाये।त्रेता युग मे उन्होंने जनक,दशरथ आदि राजाओं की लोकभावना का सम्मान किया।भगवान राम और मां सीता के स्वयंवर के साक्षी के बने।द्वापर में उन्होंने कौरव सभा मे भगवान कृष्ण के सत्य का साथ दिया और उन्हें सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया।भीष्म,द्रोण व कर्ण को भी उन्होंने शस्त्र और शास्त्र की दीक्षा दी।वह हर काल मे है उन्हें चिरंजीवी माना जाता है।वह कलिकाल में भी है।उड़ीसा के गजपति जिले में स्तिथ महेंद्र गिरी पर्वत को भगवान परशुराम का तपस्या स्थल है जहां आज भी माना जाता है कि वह तपस्यारत है और कल्पांत तक फिर समाज के लिए अवतरित होंगे।
शस्त्र और शास्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक
भगवान परशुराम शस्त्र और शास्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक है जिसकी प्रासंगिकता आज भी समाज मे है।वह आश्रमों में शास्त्र को प्रतिस्थापित तो करते ही है लेकिन उसे व्यवहार में उतारने के लिए शस्त्र भी उठाते है।इसीलिए हर काल और समय मे वह पूरी तरह से व्यवहारिक हैं।उन्होंने समाज को एक दिशा दी।उन्होंने सिद्ध किया कि शस्त्र और शास्त्र में किसी की भी उपेक्षा करने के परिणाम ठीक नही होते हैं।वह शस्त्र और शास्त्र के समन्वित शक्ति के उपयोग के संस्थापक है।वह समाज के ऐसे आदर्श महापुरुष हैं जिनकी प्रासंगिकता सदैव रही है।उन्होंने सत्य की स्थापना और असत्य को हटाने के लिए शस्त्र उठाया।वह सम्पूर्ण समाज के प्रतिनधि हैं।मनुष्य की पशुवत प्रवित्तियों के वह संहारक है।आज भी सत्य के संवर्धन और असत्य को हटाने में उनकी प्रासंगिकता महत्वपूर्ण हो जाती है।इसीलिए मान्यता है कि वह काल से परे है।जब मानव की पशुवत प्रवित्तियाँ समाज के लिए घातक हो जाती है तो शास्त्र के साथ साथ शस्त्र की भी जरूरत पड़ती है।इसी आदर्श की स्थापना के लिए भगवान परशुराम अवतरित होते हैं।भगवान राम और कृष्ण भी इसी आदर्श के संवाहक हैं।भगवान परशुराम ने इसी सत्य की स्थापना के लिए शस्त्र की भी प्रतिज्ञा की।वह शास्त्र और शस्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक हैं।सहस्त्रार्जुन के वैभव और शक्ति पर उनकी विजय इसी शस्त्र की आदर्श परम्परा को सिद्ध करती है।राज भोग के प्रति उनकी विरक्ति और शास्त्र और शस्त्र की उनकी आसक्ति केवल और केवल समाज के लिए है जो आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।
भगवान परशुराम हैं सच्चे जनप्रतिनिधि
भगवान परशुराम सही मायनों में और सच्चे जनप्रतिधि हैं।वह समानता के संवाहक है उन्होंने लोकरक्षा के लिए शस्त्र उठाया और सत्ता की शोषित और भोग की संस्कृति का नाश किया।वह शिव के उपासक है जिनके त्याग की भावना सदा समाज के लिए समर्पित रही है।भगावन परशुराम लोक रक्षा की इसी भावना के प्रवर्तक रहे है उनकी शक्ति लोक की है जिसने राज शक्ति पर विजय पाई है।वह लोक के लिए जीने वाले ऐसे आदर्श है जिनकी आवश्यकता समय समय पर हमेशा रहती है।भगवान परशुराम का आदर्श विशुद्ध समाज और लोक के लिए था,जिन्होंने सम्पूर्ण समाज के लिए राजसत्ता की विलासोन्मुखी प्रवित्तियों का नाश किया और राज सत्ता का एक आदर्श स्थापित किया।वह शैव संस्कृति के सच्चे उपासक हैं उन्होंने समानता और समभाव की शैव परम्परा की स्थापना के लिए सतत आचरण किया और समाज के लिए एक आदर्श स्थापित किया।उनका परशु समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज के लिए उठा उन्होंने शास्त्र की प्रतिस्थापन के लिए ही दुष्टों का संहार किया।भगवान परशुराम ऐसे महापुरुष है जिन्होंने त्याग और जनहित की संस्कृति को अपनाया।इसके लिए वह केवल शस्त्रों के वाचन तक ही सीमित नही रहे इसके लिए उन्होंने इसे व्यवहार में अपनाया और हर काल मे समाज को दुष्टों से मुक्ति दिलाई।पौराणिक ग्रंथों में 21 बार संहार का उल्लेख उनकी इसी निष्ठा का प्रतीक है।वह अपनी शक्ति और तपस्या का शिवत्व के लिए उपयोग करते रहे जो कि आम जन के लिए था।उनका शिवत्व महलों के वैभव और विलासिता के खिलाफ त्याग और जनता के हित में था।इसीलिए भगवान परशुराम लोकरक्षा का व्रत लेते है और त्यागपूर्ण जीवन के साथ आमजन के लिए खड़े होते है।इसीलिए वह सच्चे अर्थो में जनप्रतिधि है। भले ही उन्हें एक समाज के बंधन में बांधा जा रहा हो लेकिन वह सम्पूर्ण समाज के एक लोक प्रतिनधि हैं जो आज भी सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रासंगिक हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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