अभिषेक श्रीवास्तव
रायबरेली: आज इस कोरोना के कारण अगर सबसे ज्यादा कोई प्रबावित हुआ है, तो वो है प्रवासी मज़दूर। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए जब सरकार ने देश मे लॉकडाउन को प्रभावी समझकर घोषणा किया, तो ये भी देश के लिए एक नया ही अनुभव था। एकदम से सारा देश अपनी जगह पर ठहर गया। समस्या सबसे बड़ी दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले लोगो के सामने खड़ी हुई। फिर भी उन्होंने देशहित में अपना योगदान देते हुए अपने को जहां थे वंहा रोक लिया। किन्तु जैसे जैसे समय बढ़ता गया, संकट गहराता गया, मज़दूरों की सब्र का बांध टूटने लगा। इसके भी कई कारण हो सकते हैं एक तो उनके रहने खाने का कोई पर्याप्त इंतेजाम न होना और दूसरी तरफ शहरो में व्याप्त कोरोना की भयावह स्तिथि।
दोनों हो परिस्थितियों विकराल थी, इस वजह से प्रवासी मज़दूरों ने अपने गाँव जाने को ठान लिए, इस स्तिथि को भांपते हुए सरकार ने भी एलान किया उनको घर पहुंचाने का, सरकार ने तो ऐलान कर दिया, किन्तु व्यवस्था पर्याप्त नही हो पाई। चाहे वो इस स्तिथि का आंकलन न कर पाए हो, इसलिए उन्होंने कुछ श्रमिक ट्रैन चलाने का निर्णय लिया। लेकिन वो पर्याप्त नही थी इस अपर्याप्त व्यवस्था के कारण मज़दूरों को अन्य रास्ते अपनाने पड़ रहे हैं। चाहे वो मालवाहक वाहन हो या अन्य साधन लोगो ने पलायन शुरू कर दिया, जिनके पास रहने खाने की व्यवस्था नही थी। वो बेचारे क्या करते उन्होंने पैदल या साईकल रिक्शा से ही निकल पड़े अपने सफर पर।
जब मीडिया में ये मंजर दिखाए जाने लगे और विपक्ष ने उंगली उठाना शुरू किया, तो सरकार ने राज्यो को आदेश दिया कि, प्रवासियों को पैदल न जाने दे राज्यो ने भी उन्हें बॉर्डर पर रोकना शुरू कर दिया, आखिर फिर क्या हुआ फंसे तो वही बेचारे असहाय।
मेरा ये मनना है कि, केंद्र सरकार को अलग से धन का आवंटन करके प्रवासी मज़दूरों को गंतव्य तक पहुंचाने का कोई रास्ता जल्द ही निकलना चाहिए, और उसकी रूपरेखा केंद्रीय स्तर पर ही होनी चाहिए, क्योंकि राज्यो में समन्वय की बहुत कमी उजागर हो रही है, नही तो सड़को पर इतने प्रवासी असहाय मज़दूर नही दिखाई देते।
यह लेखक के स्वयं के विचार हैं।
रायबरेली: आज इस कोरोना के कारण अगर सबसे ज्यादा कोई प्रबावित हुआ है, तो वो है प्रवासी मज़दूर। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए जब सरकार ने देश मे लॉकडाउन को प्रभावी समझकर घोषणा किया, तो ये भी देश के लिए एक नया ही अनुभव था। एकदम से सारा देश अपनी जगह पर ठहर गया। समस्या सबसे बड़ी दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले लोगो के सामने खड़ी हुई। फिर भी उन्होंने देशहित में अपना योगदान देते हुए अपने को जहां थे वंहा रोक लिया। किन्तु जैसे जैसे समय बढ़ता गया, संकट गहराता गया, मज़दूरों की सब्र का बांध टूटने लगा। इसके भी कई कारण हो सकते हैं एक तो उनके रहने खाने का कोई पर्याप्त इंतेजाम न होना और दूसरी तरफ शहरो में व्याप्त कोरोना की भयावह स्तिथि।
दोनों हो परिस्थितियों विकराल थी, इस वजह से प्रवासी मज़दूरों ने अपने गाँव जाने को ठान लिए, इस स्तिथि को भांपते हुए सरकार ने भी एलान किया उनको घर पहुंचाने का, सरकार ने तो ऐलान कर दिया, किन्तु व्यवस्था पर्याप्त नही हो पाई। चाहे वो इस स्तिथि का आंकलन न कर पाए हो, इसलिए उन्होंने कुछ श्रमिक ट्रैन चलाने का निर्णय लिया। लेकिन वो पर्याप्त नही थी इस अपर्याप्त व्यवस्था के कारण मज़दूरों को अन्य रास्ते अपनाने पड़ रहे हैं। चाहे वो मालवाहक वाहन हो या अन्य साधन लोगो ने पलायन शुरू कर दिया, जिनके पास रहने खाने की व्यवस्था नही थी। वो बेचारे क्या करते उन्होंने पैदल या साईकल रिक्शा से ही निकल पड़े अपने सफर पर।
जब मीडिया में ये मंजर दिखाए जाने लगे और विपक्ष ने उंगली उठाना शुरू किया, तो सरकार ने राज्यो को आदेश दिया कि, प्रवासियों को पैदल न जाने दे राज्यो ने भी उन्हें बॉर्डर पर रोकना शुरू कर दिया, आखिर फिर क्या हुआ फंसे तो वही बेचारे असहाय।
मेरा ये मनना है कि, केंद्र सरकार को अलग से धन का आवंटन करके प्रवासी मज़दूरों को गंतव्य तक पहुंचाने का कोई रास्ता जल्द ही निकलना चाहिए, और उसकी रूपरेखा केंद्रीय स्तर पर ही होनी चाहिए, क्योंकि राज्यो में समन्वय की बहुत कमी उजागर हो रही है, नही तो सड़को पर इतने प्रवासी असहाय मज़दूर नही दिखाई देते।
यह लेखक के स्वयं के विचार हैं।

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