माया नगरी की कोई माया रही होगी, यूं ही कोई खुदकुशी नहीं करता

मुंबई की मायानगरी श्रीराम जैसे सुशांत के लिए उपयुक्त नहीं
मिर्जापुर। माया महा ठगिनी हम जानी, तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरी बानी दोहे में कबीर ने पूरी मायानगरी के चाल, चेहरे, चरित्र को समाहित कर दिया है।
   मुंबई माया नगरी है।  लुभाती तो बहुतों को है लेकिन कुछ ही माया के जाल-फ़ांस को भेद कर अपने ख्वाबों को साकार कर पाते हैं । जाल-फ़ास के लिए बड़ा घराना, भारी भरकम तामझाम-रुपैया-पैसा और फितरती दिमाग वालों के लिए माया नगरी  चोली के नीचे दिल है मेरा गीत की पंक्ति बन दिल खोल देती हैं । मुंबई नगरी को ये है बंबई नगरिया तो देख बबुआ, सोने चाँदी की नगरिया तो देख बबुआ आईने में देखना ज्यादा फिट होगा ।
   यहां अपने अरमानों को छलांग लगाने के लिए पहले बर्बाद होना पड़ता है। कदम-कदम पर ब्यूटी पार्लर के बल पर यहां की तारिकाएँ इंद्र-लोक की अप्सराओं, मेनकाओं, रम्भाओं, उर्वशियों से पानी भरवाती हैं । ये मुंबई पहुंचते ही लुट जाती हैं । सोचा क्या था और हो क्या गया से पर्दे पर मुस्कुराने-खिलखिलाने वाली रम्भाएँ पर्दे की आड़ में सिर्फ आंसू बहाना याद है की हालात से गुजरती हैं । तभी तो बहुतेरी तारिकाओं की चीख सुनाई पड़ती है कि मायानगरी में भेड़िए बसते हैं । यहां लुट चुकी अप्सराओं का अवचेतन-मन सिर्फ और सिर्फ पिछडे इलाकों से गए सुशांत जैसों के साथ छल भी करती हैं । लंबे सब्जबाग दिखाने वाले फ़िल्मजगत के विधाता बने डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी बेगारी लेते हैं । मुंबई की चकाचौंध में फंसे घर लौट नहीं पाते और फिर कुछ ऑटो चलाते हैं और कुछ इहलोक से परलोक की यात्रा पर निकल जाते हैं ।
  सुशांत के साथ भी कुछ तो ऐसा हुआ होगा वरना उत्कृष्ट कलाकार को फांसी न लगानी पड़ती ? सुशांत योग्य, प्रतिभा-संपन्न एवं संवेदनशील थे । कलियुग की मायानगरी मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम जैसे सुशांत के लिए नहीं रह गई है। अब इसे तिकड़म-छलछद्म की नगरी लोग मानने लगे हैं । यह सच है तो यहां रावण जैसे शातिर अट्टहास करेंगे  न कि आत्महत्या !
                       सलिल पांडेय, मिर्जापुर

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