"आशाएँ" वर्षा शर्मा

◆दिख रही है अंधेरी रात तो समझ सबेरा दूर नहीं
होंगे तो अंधियारे पथ में पर तुझे अंधियारे से रोष नहीं
उठ आशाओं का प्रदीप जला तू
रोशन कर पथ को अपने
मंजिल तेरी समीप है
थक कर न बैठ तू।।
◆काँटों से घिरा गुलाब है तू
हवाओं में गमक अपनी छोड़ जा
सूरज सा चमकना है तुझको
थोड़ा तो जलना सीख जा।।
◆आएगी विपत्तियाँ जीवन में
लड़कर आगे बढ़ना सीख तू
सफलता चरणों की दासी है
परिश्रम करना मत भूल तू।।
◆हौसलों की बुलंद तलवार से
पर्वत का सीना चीर तू
मंजिल पाने की चाह है तो
दशरथ माँझी सा जूझ तू।।
◆पा ही जाएगा मंजिल अपनी
आशाओं का दामन न छोड़ तू
मंजिल तेरी समीप है
थककर न बैठ तू।।
            ◆-वर्षा शर्मा(कवयित्री)
           ◆सुल्तानपुर, उत्तरप्रदेश

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