यह भ्रामक है कि तुलसीदास सर्प के सहारे ससुराल में पत्नी से मिले थे

मिर्जापुर । सर्प के सहारे चढ़कर ससुराल में पत्नी से मिलने पर गोस्वामी तुलसीदास को मिली फटकार की कहानी सही नहीं है। यह माना नहीं सकता कि जा सकता कि कोई व्यक्ति सर्प को पकड़कर किसी घर में चढ़ सकेगा। यह आज की तिथि में चुनौती के रूप में कोई स्वीकार करके दिखा दें कि सर्प को रस्सी समझकर घर में चढ़ा जाए और सर्प में स्पंदन न हो। सर्प को जब उपर के हिस्से में किसी स्थान पर बांधा जाएगा तभी कोई छत पर चढ़ सकेगा ।
    यह निष्कर्ष नगर के तिवराने टोला स्थित साहित्यिक संस्था डॉ भवदेव पांडेय शोध संस्थान में चिंतन गोष्ठी में उभर कर सामने आई।
   गोष्ठी में कहा गया कि यह किंवदंती है। किंवदंतियां मनगढ़ंत भी होती हैं । जबकि इस किवंदन्ति में महर्षि पतंजलि का योग-विज्ञान परिलक्षित होता है। 72 वर्ष की अवस्था में तुलसी रचना के क्षेत्र में आए। यह उनके कुण्डलिनी जागरण का दौर है। मूलाधार से उनकी ऊर्जा उर्ध्वगामी होकर जब सर्प रूप रीढ़ की हड्डी के सहारे मस्तिष्क की ओर हुई तो उनका रूपांतरण हो गया। यही महर्षि वाल्मीकि के साथ हुआ। नारद के ज्ञान देने पर लोग मुंह से राम बोलते हैं जबकि वाल्मीकि उल्टा यानी नाभि से राम जपने लगे।
  जिन महापुरुषों ने कालजयी रचना की, सबकी कुंडलिनी शक्ति जागृत हुई है। फिर तो तरंगों में प्रवाहित ज्ञान मस्तिष्क में अवतरित होने लगता है।
    इस तरह गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर उनके वैशिष्ट्य पर प्रकाश डाला गया। अध्यक्षता संस्थान के संयोजक सलिल पांडेय ने की जबकि संचालन जयराम शर्मा ने की। इस अवसर पर जलज नेत, शशांक कुमार, साकेत पांडेय आदि ने भी विचार किए ।
                         सलिल पांडेय, मिर्जापुर।

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