☸️आत्मसमर्पण, शुद्ध प्रेम की, बाट जोहते सारे ।
☸️प्रिय का प्रेम त्रिकोण बना है, रिश्ते जोड़ - घटाना,
☸️देश प्रेम में गुणा - भाग है, मतलब भरा ज़माना ।
☸️है वीभत्स रूप ही केवल, क्या कुछ सही नहीं है?
☸️ठहरो ! अब भी आस बची है, जब तक बची 'मही' है ।
☸️गुरु - शिष्य कुछ ठीक अभी हैं, आदर्शों को मानें,
☸️कठिन राह पर चलते कुछ हैं, बाकी हैं अनजाने ।
☸️माँ का प्यार, प्रकृति का अर्पण, जैसे गंगा जल का तर्पण,
☸️बेजुबान का प्यार अमर है, माँ ही करती पूर्ण समर्पण ।
Written by ~ कमल बाजपेई

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