पितृपक्ष की विशेष तिथियां

 


जीवित्पुत्रिका व्रत (10/9)

मातृनवमी (11/9)

पितृ-विसर्जन (17/9) ।

संतान दीर्घायु हो, मां निराजल व्रत रहती है। 

...पंच रचित यह अधम शरीरा। शरीर तो अधम है। इसके अंदर बहुमूल्य यदि कुछ है तो जो ...बड़े भाग मानुष तन पावा है, वह भाव दीर्घायु रहे। वरना मनुष्य जब 'पाषण हृदय' का हो जाता है तो फिर वह मनुष्य नहीं बल्कि जानवर से बदतर होकर कीटाणु और विषाणु जैसा हो जाता है।

मातृनवमी-मां ने गर्भ में अपने शरीर के रक्त-रस-रसायन से आकृति देती है । इसका वर्णन ग्रन्थ भी नहीं कर पाते । केवल मां जानती है लेकिन ता-उम्र कहती नहीं, इसलिए नवमी तिथि मां के लिए श्रद्धा प्रकट करने का दिन है।


केवल गाय, कौआ, कुत्ता को कुछ खिलाकर और कुछ कर्मकांड कर देने तथा पूजरी को कुछ दान दे देने से श्राद्ध का लाभ मिल ही जाएगा, कोई गारंटी नहीं । इसके लिए वह पीढ़ी जो अब जीवित नहीं है, जीवन पर्यंत चाहती क्या थी, उसका अनुपालन अलिखित संविधान के तहत करना चाहिए ।

     घर के यदि बड़े सदस्य हैं तो जब तक सभी छोटे सदस्य भोजन न कर लें तब तक भोजन न करें । अपने से अच्छा वस्त्र छोटे तथा अशक्त सदस्य को दें, फिर पितरों से आशीर्वाद मांगने की नहीं जरूरत पड़ेगी, स्वयमेव आशीष मिलता रहेगा ।

पितृ-विसर्जन- सिर्फ इन भावों को रखकर पितृ विसर्जन अमावस्या तिथि (17/9) को करें । जीवन में अमावस्या की कालिमा की तरह अन्धकार खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा ।

वाह्य क्रिया अंतर्जगत से होनी चाहिए

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