"चन्द सिक्कों में बिकती है आजकल कुछ की खुद्दारी"

 उसी का हुनर था जिससे ये दरिया पार की मैंने,
कहाँ कोई बताता है आजकल सब अदाकारी ।
हमीं ने खोलकर चिट्ठा दिखाया था तुम्हें उसका,
यही फ़न का तकाज़ा है हमीं पे पड़ गया भारी ।
वाकया सच बताने का कभी यदि मन में भी आया,
निवालों की पहुँच हम तक अभी भी वहीं से होती ।
उदासी मासूमियत मिलकर बनाते एक सुखन चेहरा,
आइना पढ़ नहीं सकता दिलों की साफ गोई को ।
घुटन सी आज काबिज है हवाओं में जमाने की,
कोई सीधा नहीं कहता लगे हैं बरगलाने में ।
तुम्हारी ही जरूरत थी यही मैंने कहा उससे,
गिनाने लग गया खुद की जरूरतें वह बहुत सारी ।
जहाँ में वाकये होते कहाँ सब याद रहते हैं,
जुड़ी हो बात अस्मत से कहाँ बुझती है चिंगारी ।
वक्त पर बात कहने की कला सबको नहीं आती,
करम थे मुजरिमों के वही बनता दिखा काज़ी ।
गलत कामों का लेखा भी बताते हैं लिखा जाता,
सँभल जावो छुपेरुस्तम इशारा सब तरफ जाता ।
जिसे कहते थे तुम मुल्ज़िम जमाना पाक कहता है,
चन्द सिक्कों में बिकती है आजकल कुछ की खुद्दारी।
                         रचयिता~कमल बाजपेई

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