"मिल गया रक्षा कवच माँ की दुवाओं का उसे"


¶ मैं उधेड़बुन में था, क्या कहूँ, कैसे कहूँ, किससे कहूँ, बेतकल्लुफ सोचे बिन कहता गया सब दास्तां ।

¶ गुरुरे दौलत रखो तुला पर लो मैने रख दी कलम हमारी, कलम का पलड़ा झुका हुआ था, इसी तरफ कायनात सारी।

¶ वही हम हैं कि गरजते थे कभी बादलों की तरह, वही हम है कि बोलो तो दम उखड़ती है ।

¶ कतरा - कतरा उम्र का हमने खपाया देश में, देख संजीदा हमारी अब नई पीढ़ी हुई ।

¶ हमारी जान बसती है यहाँ की पावन मिट्टी में, जिगर का टुकड़ा है महज़ हिन्दोस्तान थोड़ी है ।

¶ जमाने भर की खुशियाँ भी उसको हँसा पायी नहीं, आप ने क्या कह दिया वह रात भर हँसता रहा ।

¶ बद्दुआवों का असर होता नहीं उसको कमल, मिल गया रक्षा कवच माँ की दुवाओं का उसे ।

¶ रचयिता~कमल बाजपेई

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