"नूर का जनाज़ा हो या बहादुर की अर्थी"

¶ मेरे गाँव में पहले कोई दुराव न था, होली में गाते फाग, छप्पर सभी उठा लेते ।

¶ किसी को कोई काम पड़े बिन बुलाये जाते थे, अजीब लोग थे खैर सबकी वो मना लेते ।

¶ बिटिया की शादी गाँव में जब भी मेरे होती, लोग मिल बाँटकर यहाँ काम सभी कर लेते ।

¶ घर का ही माहौल शादियों में यहाँ होता, डोली बिटिया की उठे फूट - फूट कर सभी रोते ।

¶ सभी की पूछते सलामती सभी आते - जाते, दूध - दही - मट्ठा मिल बाँटकर यहाँ खाते ।

¶ नूर का जनाज़ा हो या बहादुर की अर्थी, काँधा देने की यहाँ होड़ सभी को रहती ।

¶ रचयिता ~ कमल बाजपेई

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