ये तो सबका साथ, सबका विकास नहीं है

गरीबों की थाली का आधार आलू, देश में 45 रुपए किलो बिक रहा है, जबकि प्याज की कीमत 55 रुपए किलो है। कई राज्यों में बारिश के कारण फसल खराब हुई।

गरीबों की थाली का आधार आलू, देश में 45 रुपए किलो बिक रहा है, जबकि प्याज की कीमत 55 रुपए किलो है। कई राज्यों में बारिश के कारण फसल खराब हुई, इसके साथ परिवहन महंगा होने का असर कीमतों पर पड़ा, और एसेंशियल कमोडिटी एक्ट में संशोधन के बाद जब जमाखोरी लाइसेंसी हो गई है, तो समर्थ व्यापारी बेखौफ आलू-प्याज का भंडारण कर रहे हैं, और बाजार में ऊंचे दामों पर इसे बेच रहे हैं।

     आपको बता दें कि, अक्टूबर में थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति बढ़कर 1.48 प्रतिशत पर पहुंच गई है। वहीं सब्जियों के दाम 25.23 प्रतिशत और आलू और के दाम 107.70 प्रतिशत , जबकि गैर-खाद्य वस्तुओं के दाम 2.85 प्रतिशत और खनिजों के दाम 9.11 प्रतिशत बढ़ गए हैं। ये अर्थव्यवस्था का एक पहलू है, जिसके भुक्तभोगी गरीब और साधारण जन हैं। दूसरी ओर शेयर मार्केट में अलग किस्म की तरक्की देखने मिल रही है। नवंबर की शुरुआत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के सेंसेक्स ने पहले 42,000 के आंकड़े को पार किया, फिर 43,000 को पार किया और 17 नवंबर को सेंसेक्स ने शुरुआती कारोबार में 44,000 के आंकड़े को छूकर इतिहास रच दिया। ये अर्थव्यवस्था का दूसरा पहलू है जहां शेयरों की बाजीगरी कर हजारों करोड़ का कारोबार हो रहा है, कुछ लोगों के मुनाफे को देश की खुशहाली बताया जा रहा है। अब ये जनता ही तय कर ले कि देश विकास की राह पर जा रहा है या विनाश की राह पर।

      शेयर मार्केट की चकाचौंध, सी प्लेन की उड़ान के बूते मोदी सरकार तो अब भी देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के दावे कर रही है। इसके लिए आत्मनिर्भर अभियान चलाया जा रहा है। मोदीजी किसी प्रवचक की तरह जमीनी सच्चाइयों से मुंह मोड़ते हुए कभी नए अफसरों से, कभी सैनिकों से, कभी विद्यार्थियों से इनोवेटिव होने यानी नवाचारी बनने का ज्ञान बांटते हैं, कभी साधु-संतों से भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मार्गदर्शन करने की अपील करते नजर आते हैं। उनकी बातें सुनने में लुभावनी लगती हैं, लेकिन असल में वे सच्चाई से ध्यान भटकाने वाली होती हैं। पुरानी कहावत है कि आग लगने पर कुआं नहीं खोदा जाता, यहां तो मोदीजी तुरंत कुआं खोदने की बात भी नहीं करते, उसके लिए भी वे भविष्य की योजनाएं तैयार करते हैं। यही कारण है कि देश में आम आदमी की तरक्की अविचारित फैसलों की आग में झुलसती जा रही है।

     सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की हालत खस्ता होती जा रही है, तो उनका विलय कर समस्या का हल सरकार ढूंढ रही है। लेकिन बैंकों में रखा आम आदमी का पैसा अब भी सुरक्षित नहीं है। इसका ताजा उदाहरण है पिछले 24 घंटों में 2 बैंकों पर आरबीआई की कार्रवाई। पिछले 3 सालों से घाटा दर्शाने वाले लक्ष्मी विलास बैंक पर आरबीआई ने प्रतिबंध लगाया गया है। खाताधारकों की आवश्यकता को समझते हुए महीने भर के लिए 25 हजार रुपये निकालने की सुविधा दी गई है और अब इसका डीबीएस बैंक के साथ विलय होने वाला है। इससे पहले आरबीआई ने यस बैंक और पीएमसी बैंक को लेकर भी इसी तरह के कदम उठाए थे। जिससे ग्राहकों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था।

     लक्ष्मी विलास बैंक के साथ ही महाराष्ट्र के जालना जिले के मंथा अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक पर रोक लगाई गई है। आरबीआई ने बैंक को कुछ निर्देश दिये हैं। जैसे बैंक को आरबीआई की अनुमति के बिना किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कर्ज देने की इजाजत नहीं होगी। इसके अलावा पुराने कर्जों का नवीनीकरण या बैंक में निवेश करने पर भी पाबंदी होगी। ये निर्देश 17 नवंबर 2020 को बैंक बंद होने से अगले 6 महीनों के लिए लागू रहने वाले हैं।

      बीते कुछ सालों में एक के बाद एक घोटाले या बैंकों में अनियमितता के प्रकरण सामने आ रहे हैं और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या जैसे लोगों पर कार्रवाईयों की बात तो खूब होती है, लेकिन धरातल पर उसका असर बेहद मामूली होता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर लोगों की निगाह में नायक बनने वाले लोग अब पिछले दरवाजे से सरकार से हाथ मिला चुके हैं और अब भी कोई आवाज उठाए तो सरकार के पास सांप्रदायिक मुद्दों को खड़ा करने का धारदार हथियार मौजूद है या फिर प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों का उपयोग धड़ल्ले से विरोधियों की आवाज दबाने के लिए किया जाता है।

      जैसे, यह महज संयोग है या सोचा-समझा फैसला कि केंद्र सरकार ने बीते हफ्ते प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशक संजय कुमार मिश्रा की नियुक्ति के लिए वर्ष 2018 में जारी आदेश में संशोधन करते हुए उनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया है। 19 नवंबर 2018 को उन्हें ईडी का निदेशक नियुक्त किया गया था। ईडी निदेशक का निश्चित कार्यकाल दो साल होने की वजह से उनका कार्यकाल इस हफ्ते खत्म हो रहा था।

     लेकिन वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग ने बीते शुक्रवार को एक अप्रत्याशित आदेश जारी कर कहा कि मिश्रा की नियुक्ति के लिए वर्ष 2018 में जारी आदेश में संशोधन किया गया है और राष्ट्रपति ने इसकी मंजूरी दे दी है, इस तरह मिश्रा का कार्यकाल अब तीन सालों का होगा। गौरतलब है कि, संजय कुमार मिश्रा विपक्ष के कई नेताओं के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों को देख रहे हैं।   आलोचकों का कहना है कि राजनैतिक बदला लेने के लिए अब ईडी का उपयोग सरकार कर रही है। इस तरह के इल्जामों की सच्चाई तो सरकार ही बता सकती है।

     देश में संस्थाओं की स्वायत्तता और पारदर्शिता की जिम्मेदारी उसी पर है और देश में आम आदमी की खुशहाली या बदहाली की जिम्मेदार भी वही है। अगर देश में कुछ लोगों की संपत्ति में सौ फीसदी से ज्यादा का इजाफा हो रहा है और बहुतेरे लोग अपनी आमदनी और जमापूंजी को लेकर चिंतित हैं तो इसे सबका साथ, सबका विकास कतई नहीं कहा जा सकता।

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