विकास की चकाचौंध से बदहाल है आजादी के परवानों की कर्मस्थली कंजेश्वर धाम।। Raebareli news ।।

रजनीकांत अवस्थी

बछरावां/रायबरेली: द्वापर कालीन स्मृतियों को संजोए और जंगे आजादी की लड़ाई में लखनऊ उन्नाव व रायबरेली के क्रांतिकारियों की कर्मस्थली कंजेश्वर धाम आज विकास की रोशनी से महरूम हो रहा है, बछरावां कस्बे से 13 किलोमीटर दूर पस्तोर ग्राम सभा में सई नदी के तट पर बसा यह 5 मंजिला मंदिर कभी पांडवों के अज्ञातवास की यादें संजोए हुए हैं।

    आपको बता दें कि, पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वापर युग में वनवास के दौरान पांडवों द्वारा अपनी माता कुंती के साथ इस क्षेत्र का भ्रमण किया गया था, जिसके गवाह भीमेश्वर, भवरेश्वर मंदिर अहिरवार, राती में स्थित पांडवों का कुआं आदि स्थित है।

   वहीं स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बछरावां के मालवीय राजामऊ में जन्मे मुंशी चंद्रिका प्रसाद ने यहां अपनी कर्मस्थली बनाई थी, यहां का जंगल और सई नदी के द्वारा बनाई गई कटाने आंदोलनकारियों के छिपने की पनाहगाह बनती थी। लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली के क्रांतिकारियों की बैठकें यहां आए दिन हुआ करती थी। मुंशी चंद्रिका प्रसाद द्वारा यहां से हस्तलिखित समाचार पत्र विजय का प्रकाशन किया जाता था, और यही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पर्चे व पोस्टर के मैटर तैयार किए जाते थे, जो आजादी के दीवाने अपने झोलों में भरकर गांव-गांव बांटते थे, और जनता को जागरूक किया करते थे।

     1947 के बाद मुंशी चंद्रिका प्रसाद बछरावां चले आए, और माधव आश्रम पर रहने लगे, जहां उन्होंने धर्मशाला, अखाड़ा पुस्तकालय तथा डिग्री कॉलेज से लेकर इंटर कॉलेज तक की आधारशिला रखी। राजामऊ में अपने पिता के नाम पर आयुर्वेदिक अस्पताल तथा पुस्तकालय की स्थापना की। मुंशी चंद्रिका प्रसाद के आने के बाद कंजेस्वर धाम उपेक्षित हो गया। यह जरूर हुआ कि, वहां का मंदिर क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों तथा बुद्धजीवीओं के द्वारा गाहे-बगाहे देखभाल की जाती रही, परंतु मौजूदा समय में मंदिर के ऊपरी हिस्से काफी हद तक कमजोर हो चुके हैं, और किसी भी क्षण गिरने की कगार पर है। वैसे यहां प्रत्येक बसंत पंचमी को 10 दिवसीय विशाल मेले का आयोजन होता है। जिसमें क्षेत्र के लोगों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ एक स्वस्थ मनोरंजन प्राप्त करते हैं।



     यहां मंदिर में भोलेनाथ का दर्शन कर लोग जहां पुण्य अर्जित करते हैं, तो वही एक कहावत भी क्षेत्र में प्रचलित है कि, यहां किसी भी चीज की फरियाद करने पर भोलेनाथ उसकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं, परंतु सबसे विवादास्पद तथ्य यह है कि, ऐतिहासिक और स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण यादें अपने अंतस्थल में समेटे इस कंजेस्वर धाम की ओर सरकार द्वारा कोई विकास नहीं कराया गया। स्वर्गीय इंदिरा गांधी के  प्रधानमंत्री काल में यह चर्चा जरूर चली थी कि, यहां सई नदी पर पुल बनवाकर उन्नाव जनपद के दूरस्थ गांवों को जोड़ा जाएगा। यह प्रस्ताव मौजूदा समय में जरूर मूर्त रूप ले चुका है।

    नदी पर पुल बन जाने के कारण इस स्थान की महिमा जरूर कुछ बढ़ गई है, लेकिन आवश्यकता है कि, सरकार इसे पौराणिक तथा आजादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि को समझते हुए इस स्थान का समुचित विकास करें।

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