मातृशक्ति को दागदार करता है शूर्पणखा का चरित्र

रमेश तोरावत जैन अकोला

मैं बहुत हैरान था कि, ईश्वर अवतार श्री लक्ष्मण जी इतने निष्ठुर कैसे हो गए कि, किसी महिला के प्रेम निवेदन करने पर उस की नाक ही काट ली.. क्या उन्हें किसी के प्यार का कोई अहसास नही था.. क्या शूपर्णखा के जज्बातों को वे समझ नही पाए.. क्या महिलाओ का सम्मान करना उन्हें नही आता था.. या उन्हें अपने सुर्यवंशी होने का गरूर था जो कि किसी आम महिला के प्रेम निवेदन को स्वीकार नही कर सकता था.. मगर ऐसा नही था.. सच कुछ और था.. ये दास्तान अगर सचमुच सच्चे प्यार की होती तो आज इतिहास में शूर्पणखा की महिमा गायी जाती.. उस की शान में कसीदे गढ़े जाते.. दुनिया उस पर बलिहारी जाती मगर ऐसा नही हुआ बल्कि वो अपनी नाक ही कटा आयी.. श्रीराम जी के भाई इतने कुपित हुए की शूर्पणखा को दंड दे बैठे.. आज तक मैं यही समझ रहा था कि सतयुग का यह प्रकरण एक तरफा प्रेम का मामला है और श्री लक्ष्मण जी को इतना नाराज नही होना था कि किसी महिला को दंड दे दे.. मैं तो शूर्पणखा के चरित्र पर बहुत कुछ लिखना चाहता था.. उस  की अगन उसकी लगन को नमन करना चाहता था मगर मेरे मित्र पंडित रवि शर्मा ने जो बताया वो सुन तो मै हैरान ही रह गया.. ये कोई प्यार मोहब्बत दिल दा मामला नही था बल्कि ये तो वासना और कामेच्छा की पूर्ति हेतु रचा गया षड्यंत्र था.. श्री रवि शर्मा बताते हैं कि भगवान श्रीराम जी अपने वनवास के दौरान चित्रकूट ( वर्तमान में महाराष्ट्र का नासिक ) में थे और वही उन पर शूर्पणखा की नजर पड़ी.. शूर्पणखा.. हा शूर्पणखा.. रावण की बहन शूर्पणखा.. रामायण की नींव की सब से पहली घटक शूर्पणखा.. भगवान श्रीराम बहुत सुंदर.. बहुत प्यारे.. मन को भाने वाले.. मजबूत कद काठी वाले थे.. शूर्पणखा ने कभी ऐसे व्यक्तित्व को देखा नही था.. वो राम जी पर मोहित हो गयी.. वो मर्यादा पुरषोत्तम राम पर आसक्त हो गयी.. उस की आँखो में लाल डोरे तैरने लगे.. वो मिलन के लिए व्याकुल होने लगी.. वो रामजी से प्रेम निवेदन कर बैठी.. वो प्रणय हेतु गिड़गिड़ाने लगी.. मगर वो भूल गयी कि जिन के वो सपने देख रही है वो कोई साधारण मनुष्य नही है.. वो कोई आम इंसान नही है जो कि हुस्न की गर्मी में पिघल जाए.. वो तो पुरुषोत्तम थे.. सभी पुरुषों में उत्तम.. ईश्वर.. भगवान..  अवतार.. इन बातों से जिन का कोई सरोकार नही.. इस व्याधि से जो बीमार नही.. श्रीराम बोले भी.. हँस कर मुस्करा कर बोले.. बहन मैं पत्नी धर्म का पालन करता हु.. मेरा परिवार है.. मेरी पत्नी है.. जिस रिश्ते में तुम मुझे बाँधना चाहती हो वह अनैतिक है.. तुम जैसी ब्राह्मण कन्या को यह शोभा नही देता.. तुम अपनी इंद्रियों को काबू में रखो.. लोक लज्जा का भय रखो.. मगर शूर्पणखा को यह सब कहा सुनाई दे रहा था.. वो तो बावरी सी हुई जा रही थी.. उस के शरीर में कामवासना के शोले दहकने लगे थे.. उन शोलो से उसे राहत चाहिए थी.. उसे रामजी की हा चाहिए थी.. मगर वो रामजी थे.. श्रीरामजी थे.. पावन थे.. पवित्र थे.. दुनिया के गंदगी को धोने वाले थे.. फिर भला वे कैसे इस कलंक को गले लगा लेते.. फिर भला वे कैसे त्रिया चरित्र में उलझ जाते.. उसे बहुत समझाया.. भले बुरे की सुध करायी.. मगर वो नही समझी.. वो नही मानी.. बार बार प्रेम निवेदन करने लगी.. बार बार सीमाये लाँघने लगी.. जब पानी सर से ऊपर बहने लगा तो रामजी ने शूर्पणखा को लक्ष्मण जी के पास भेज दिया.. और वो रावण की बहन लक्ष्मण जी को देख कर तो और भी अधिक बौरा गयी.. राम जी उसे लक्ष्मण जी से कमतर नजर आने लगे.. लक्ष्मण जी मे उसे विश्व की सारी खूबसूरती नजर आने लगी.. रामजी को बिसरा  वो उन के भाई पर मोहित होने लगी.. लक्ष्मण जी भी अति रूपवान और आकर्षक थे.. शूर्पणखा उन्हें पाने के ख्वाब बुनने लगी.. लक्ष्मण जी से प्रणय निवेदन कर ने लगी.. लक्ष्मण जी ने भी उसे बहुत समझाया.. उसे अपने परिवार की मर्यादा का भान रखने हेतु कहा.. मगर वो कामातुर कहा मानने वाली थी.. उस के प्रारब्ध में तो पहले ही लिख दिया गया था कि नाक कटने वाली है.. सच भी तो है कि विनाश काल ए विपरीत बुध्दि.. लक्ष्मण जी परेशान हो गए.. उस से पीछा छुड़ाने लगे.. उस से बचने लगे मगर वो जिद्दी रावण की बहन थी न.. वो लक्ष्मण जी को फतह करना चाहती थी.. अपनी हवस की आग को वो लक्ष्मण जी की गंगा से शांत करना चाहती थी.. लक्ष्मण जी परेशान हो गए.. बडे भाई ने शूर्पणखा को आदर्श जीवन के पाठ ग्रहण करने हेतु लक्ष्मण जी की और इशारा किया था मगर वो मुसीबत बन उन के ही गले मे पड़ गयी थी.. और जब वो प्रेम और स्नेह की भाषा नही समझने लगी तो लक्ष्मण जी आग बबूला हो गए.. उस की नाक ही काट दी.. अपने तीखे नाक नक्श के बलबूते पर डोरे डालने वाली शूर्पणखा को ऐसा बना दिया कि कोई उस की और देखना भी पसंद न करे.. और फिर गुस्से से भरी शूर्पणखा बदला लेने की सोचने लगी.. बदला.. ऐसा बदला की जिसे दुनिया आज तक नही भूली है.. जिसे दुनिया कभी नही भूलेंगी.. जब तक इस संसार मे मनुष्य जाति का अस्तित्व है ये दास्तां हमेशा रहेगी.. मनुष्य न भी हो तो सूरज चाँद सितारे इस इतिहास को जिंदा रखेंगे.. माँ सीता मैया के हरण की कहानी कभी नही भूलेंगे.

    शूर्पणखा भाई रावण के पास गयी.. वो श्रीराम के खानदान को नष्ट कर देना चाहती थी.. वो बदले की आग में जल रही थी..  बदले स्वरूप में सीता मैया को दंडित करना चाहती थी.. रावण के पास उस ने सीता मैया जी के रूप लावण्य का ऐसा बखान किया कि रावण सीता जी को पाने के षड्यंत्र रचने लगा.. शूर्पणखा भूल गयी कि वो एक स्त्री है और एक स्त्री हो कर एक स्त्री के बर्बादी कारण नही बनना चाहिए.. मगर वो रामायण गाथा की जड़ बनी.. वो सीता मैया का दुर्भाग्य बनी.

    बहुदा कामातुर स्त्रियों के प्रसंग बहुत कम या नही के बराबर पढ़ने में आते हैं.. वासना और काम का सारा इतिहास पुरुषों के माथे ही है.. शूर्पणखा   ने इस क्षेत्र में घुसपेठ की.. शूर्पणखा ने नारी जाति को लजाने का काम किया.. शूर्पणखा ने स्वयं के परिवार के नाश होने की बुनियाद रखी.. शूर्पणखा ने लंका की तबाही लिखी.

   शूर्पणखा मेरी जिज्ञासा का विषय है.. उस का चरित्र मेरे लिए खोज का विषय है.. उस का दुःसाहस मेरी उत्सुकता बढ़ाता है.. वो रावण की बहन थी.. वो लंका की राजकुमारी थी फिर भी उसे यह होश नही था कि स्त्री का कौमार्य किसी भी राजपाट से बहुत अधिक  मूल्यवान है.. उस की इज्जत आबरू ही उस का सब से बड़ा गहना है.. उस का किसी गैर मर्द के सामने बिछ जाना उस के निम्न स्तर के होने का पता चलता है.. तो क्या खानदानी संस्कार कोई मायने नही रखते हैं.. क्या तन बदन की आग में पुरखो की इज्जत जला दी जाती है.. क्या वासना के तूफान में सदियों तक न धुलने वाले कलंक को पाया जाता है..?

    पंडित रवि शर्मा अगर मुझे शूर्पणखा की आसक्ति के बारे में नही बताते तो मैं यही समझता था कि वो प्रेम से भरी महिला है जिसे लक्ष्मण जी का साथ नसीब नही हुआ.. कभी कभी मैं सोचता हूं कि अगर सच मे ही शूर्पणखा प्रेम की मारी होती तो क्या होता..? राम जी फिर भी उस के निश्छल प्रेम को स्वीकार तो कदापी नही करते.. हा यह जरूर हो सकता था कि वे उसे अपने कुनबे में शामिल कर लेते.. अपने सहयोगी में स्थान दे देते.. और वो भी सच्ची प्रेम स्नेह करने वाली होती तो इतने मिलने पर भी अपने भाग्य पर इतराती.. यह क्या कम सौभाग्य होता कि उसे श्री रामजी का सानिध्य मिलता.. रोज रोज आशीर्वाद मिलता.. रोज प्रभु के दर्शनों का लाभ मिलता.. यह दौलत उस की वासना से बहुत बड़ी होती.. यह नियामत उस की सारी चाहतों से बड़ी होती.. शबरी सा प्यार उसे करते नही आया.. शबरी सा हक उसे लेते नही आया.. हक.. हा हक.. हक से ही तो शबरी ने झूठे बेर भगवान को खिलाएं थे..  भगवान ने उसे हक दिया था.. मात्र बेर खिलाने पर इतना बड़ा हक दिया कि राम जी के साथ साथ आज भी शबरी जी को याद किया जाता है.. शबरी के प्रेम में भक्ति थी.. शबरी के प्रेम में शक्ति थी.. तभी तो काँटो से भरे वन में श्रीराम जी शबरी तक पहुँच गए.. शबरी के बेर ग्रहण कर लिए.. शूर्पणखा के प्यार में मिलावट थी.. देह की आग थी.. यह आग दूरिया पैदा करती है.. यह आग रिश्तों को जलाती है.. गर सच्ची चाहत होती आज मीराँ जी के साथ साथ शूर्पणखा के भी मंदिर जी होते.. मीराँ जी कुछ सो साल पुरानी है ओर पूजी जा रही और शूर्पणखा हजारो साल पहले की है और आज भी दुत्कारी जा रही है.. गौरतलब है कि भारतवर्ष की संस्कृति ने अपने इतिहास में कभी भी काम वासना को महिमा मंडित नही किया.. इसे हमेशा दोयम दर्जे का माना गया.. कहा तो यह भी जाता है कि शास्त्रो में वासना को सिर्फ संतति उतपन्न के लिए ही उपयोग की इजाजत है मगर आज के दौर में भला कौन इन बातों से सहमत होता है.. सभी का एक ही लक्ष्य होता है और वो है अपनी कामेच्छा की पूर्ति.. समय के साथ साथ  शूर्पणखा को मर जाना चाहिए था मगर वो अमृत पी कर आयी सी लगती है.. आज हम सभी इंसानो में शूर्पणखा  अपने पूरे वजूद के साथ मौजूद हैं.. पूरे विश्वास के साथ मौजूद हैं.. और यह विश्वास दिन ब दिन बढ़ेगा क्यो की कोई लक्ष्मण आज नही है हमारी नाक को काटने वाला.. कोई राम नही है हमे दिशा बोध कराने वाला.. हम दिशा हीन दुनिया मे तब्दील हो गए हैं मगर फिर भी सतयुग में शूर्पणखा का होना कई सवालों को खड़ा करता है.. बकौल एक फ़िल्मी गीत की श्रीरामचन्द्र कहे गए सिया से ऐसा कलजुग आयेगा हँस चुगेगा दाना तिनका कौव्वा मोती खायेगा को सुन सतयुग की महिमा गाने के बड़े भाव होते हैं मगर सतयुग में शूर्पणखा जैसे चरित्र को मौजूद देख दिल को बड़ा दिलासा मिलता है कि श्रीराम जी के होते हुए जब ऐसे वासनान्ध मौजूद हो तब श्रीराम जी के अभाव में आज की दुनिया में जो घट रहा है उस का जिम्मेदार कौन है..? ये किस्से बहुत लंबे चलेंगे.. इन बातों का कोई थाह नही.. ये बहुत रुचिकर विषय है और हमेशा रुचिकर ही रहेंगा.. बहुत कुछ इस विषय पर लिखा जा चुका है खोजा जा चुका है मगर मैं जानता हूं इस पर हमेशा लिखा जाएगा.. ये इंसान जिधर देखने की मनाही हो उधर ही अधिक ताकझांक करता है.. इंसान दोषी है या नही यह एक अलग विषय है मगर जिन क्रियाओं से वह जन्मा है उस विषय मे उसे अरुचि हो यह मुझे सम्भव नही लगता है.. जिन्होंने अरुचि बतायी वे श्रीराम बने.. भगवान गौतम बुद्ध बने.. भगवान महावीर बने.. मैं भी महावीर जी.. गौतम जी और श्री राम जी बनना चाहता हु मगर जानता हूं कि यह तो मुंगेरीलाल के हसीन सपने है.. अनेक अनेक धन्यवाद.

    रमेश तोरावत जैन अकोला

    मोब 9028371436

यह लेखक के निजी विचार हैं (इस लेख पर दावा नहीं किया जा सकता।)

एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ