सार........
⭕ रायबरेली जिले के ग्राम सभा मोन के जियापुर और कोडरी गांव के लोग सालों से एक पुल के निर्माण की आस में बैठे हैं। नेताओं के खोखले वायदों से तंग आकर ग्रामीणों ने पुल न बनने की सूरत में आने वाले विधानसभा चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करने की ठान ली है।
विस्तार.........
रजनीकांत अवस्थी
महराजगंज/रायबरेली: यूपी के रायबरेली में तहसील महराजगंज की ग्राम पंचायत मोन में एक कच्ची सड़क कोडरी जियापुर होते हुए हैदरगढ़ महराजगंज मार्ग को जोड़ती है। बीच रास्ते में एक छोटी सी बरसाती नदी (नैय्या नाला) की धारा है। धारा के ऊपर एक पुल बनना है, लेकिन उच्चाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण सालों से 700 आवादी वाले इन गांवों के लोग एक पुल के निर्माण की आस में बैठे हैं। नेताओं के खोखले वायदों से तंग आकर ग्रामीणों ने पुल न बनने की सूरत में आने वाले विधानसभा चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करने की ठान ली है।
आपको बता दें कि, यह रास्ता मोन ग्राम पंचायत की सीमा क्षेत्र में है, जो कोडरी जियापुर गांव होते हुए हैदरगढ़ महराजगंज मार्ग को जोड़ता है। स्थानीय लोगों राजकुमार सिंह, अशोक, श्रीराम, मुन्ना, अजीत कुमार, रामचंद्र राजू मौर्य, संत दीन मौर्य, रिंकू सिंह, चंदन सिंह आदि ने बताया कि, बरसात के दिनों में नैय्या नाला के नीचे तेज रफ्तार में तो धारा बहती ही है, आम दिनों में भी नैय्या नाला में पानी भरा रहने के कारण पार करना मुश्किल हो जाता है, जिसके कारण इन दोनों गांव और आसपास के लोगों के सामने रोजगार का भी संकट है, साथ ही बच्चे पढ़ाई से भी वंचित हैं। यहां के बच्चों को दो किमी. दूर प्राथमिक विद्यालय मोन और प्राथमिक विद्यालय लालगंज पढ़ने जाना पड़ता है।
ग्रामीणों के अनुसार जब भी विधानसभा चुनाव आते हैं वोट मांगने के लिए प्रत्याशी पुल निर्माण करवाने का लुभावना वायदा करके चुनाव जीतने के बाद इधर पलट कर गांव वालों की सुध तक नहीं लेते हैं।
गांव के संत दीन मौर्य कहते हैं कि, सरकार के पास अरबों की संपत्ति है, मगर नैय्या नाला का पुल बनवाने के लिए उनके पास पैसा नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि, पुल न होने के कारण 5 वर्ष पहले एक 12 वर्षीय बच्चे की तेज़ धार में बहकर मौत हो गई थी। अगर सरकार 2027 से पहले पुल का निर्माण कर देती है, तो ठीक है, वरना कोडरी और जियापुर गांव के लोग एक भी वोट डालने नहीं जाएंगे।
स्थानीय निवासी राजू मौर्य ने बताया कि, जियापुर और कोडरी गांव में करीब 700 की आबादी हैं, यहां के बच्चें शिक्षा से तो वंचित ही है, साथ ही युवाओं के सामने रोजगार की भी बहुत बड़ी समस्या खड़ी है। कुछ दिनों पहले हम ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार का मन बनाया था, किन्तु नेताओं को भनक लगते ही उन्होंने आकर खूब आवश्वासन दिया था, जिसके बाद हम सभी ने मतदान किया था, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। गांव के लोगों ने अब मिलकर फिर फैसला किया है कि, इस बार किसी नेता के झांसे में नहीं आयेंगे। सरकार ने अगर विधानसभा चुनाव 2027 से पहले नैय्या नाला पर पुल का निर्माण करा दिया तब हम ग्रामीण वोट डालने जायेंगे अन्यथा बहिष्कार करेंगे।
गांव निवासी अशोक कहते हैं कि, उन्हें और गांव के बाकी लोगों को बरसात में राशन लेने के लिए 5 किलोमीटर घूम कर पंचायत जाना पड़ता है। स्थानीय विधायक श्याम सुंदर भारती, पूर्व विधायक रामलाल अकेला, पूर्व विधायक राजाराम त्यागी और बाकी नेताओं से नैय्या नाला में पुल बनवाने की गुहार लगाई गई थी, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। वह आगे कहते हैं कि, अगर पुल निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया तो सारे गांव वासी प्रदर्शन करेंगे और आगामी विधानसभा चुनाव चुनाव का बहिष्कार करेंगे।
ग्राम प्रधान श्याम कला का कहना है कि, पुल न होने के कारण कोठरी और जियापुर गांव के लोग बड़ी कठिनाइओं का सामना करते हैं। सबसे अधिक मुश्किल बच्चों को स्कूल आने जाने में होती है, इसके अलावा गांव में अगर कोई बीमार पड़ जाता है तो उसे अस्पताल आने जाने में भी कठिनाइयां होती है। सड़क और पुल दोनों न होने से गंभीर रूप से बीमार लोग अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। कई बार अस्पताल ले जाते समय गर्भवती महिलाओं के मिसकैरेज की घटनाएं भी हुई है। उन्होंने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत मिट्टी का काम करवाया है जिससे ग्रामीणों को कुछ राहत मिली है। उन्होंने पुल निर्माण के बाबत कई पत्र सांसद रायबरेली के नाम लिखकर प्रेषित कर चुकी हैं, किंतु अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
प्रधान पति अमरेश कुमार कहना है कि, नैय्या नाला पर पुल निर्माण के अलावा 700 आवादी वाले दोनों गांव में बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए कोई प्राथमिक विद्यालय भी नहीं है, ग्राम पंचायत में दो प्राथमिक विद्यालय हैं भी, तो वह दो किमी. की दूरी पर है, जिससे यहां के बच्चे शिक्षा से भी वंचित हैं। परिवार के जीविकोपार्जन के लिए शिक्षा के आभाव में यह बच्चे नैय्या नाला के किनारे गाड़र की जड़ खोदकर बेचते हैं और उससे मिला धन जीविकोपार्जन में लगातें है।







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