मुंशी प्रेमचन्द्र के पूस-माघ की रात आ ही गयी !---
'कम्बल-अवतार उदारमनाओं' के दर्शन-उपदेश का है यह दो महीना---
सलिल पांडेय
मिर्जापुर: हिंदी साहित्य में निम्न तबके के दर्द से वाकिफ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद्र ने मौसम की मार झेलते एक बेबस किसान को पूस महीने में तड़पते देखा तो तीन रुपए के कम्बल का इंतजाम न कर पाने के वाकए को इस कहानी में चित्रित किया । इस कहानी का मुख्य पात्र हलकू पूस की रात में जबरा कुत्ते के साथ खेत की रखवाली करता तो है लेकिन कम्बल के रूपए साहूकार के ले लेने से वह कम्बल नहीं खरीद सका । ठंडक के चलते नीलगायों से खेत की रखवाली नहीं कर सका । जब वह पूस की रात में खेत चरते जानवरों की ओर घास-फूस की अलाव छोड़कर जाता तो शीतलहरी से हिम्मत न पड़ती और हलकू फिर अलाव के पास लौट आता रहा ।
उस जमाने में 3 रुपए का कम्बल--
लगभग सवा सौ साल पहले प्रेमचंद्र के जमाने में कम्बल 3 रुपए का रहा होगा, क्योंकि उन्होंने इसकी कीमत इतनी ही लिखी है । सवा सौ साल पहले के अन्य वस्तुओं के मूल्य चाहे कई हजारों में हो गया हो लेकिन हलकू वाला कम्बल अभी भी 50-60 रुपए में ही मिल रहा है ।
क्योंकि 'महानुभावलोग' इतने का ही कम्बल बांट रहे हैं---
पूस-माघ का महीना बहुतों को 'महानुभाव' 'प्रख्यात समाजसेवी', 'उदारमना' आदि से अलंकृत होने का महीना होता है । वे 50-60 रुपए का थोक में कम्बल जुटातेे हैं । इसके बाद बड़ा सा जलसा, महोत्सव, सेवा कैम्प आदि लगता है । बड़ा सा मंच शोभायमान होता है । क्लास वन और क्लास टू श्रेणी के लोग बुला लिए जाते हैं तथा फोर्थ श्रेणी का यह कम्बल बांटा जाता है । खूब तालियां बजती हैं । फोटोग्राफर भी मजबूर होते हैं । एक तो ड्यूटी, दूसरे एकाध कम्बल की व्यवस्था का मामला । साथ में कुछ दान-दक्षिणा के बल पर ये 'कम्बल अवतारी भगवान' छा जाते हैं जिले-जंवार में । सोशल मीडिया के बल देश-विदेश भी यश-कीर्ति लहराने लगती है।
तौल वाला कम्बल भी--
विगत सालों में एक 'फैन्स भाई' (ये भाई एक एसोसिएशन के नामी हस्ती हैं) के स्वयंभू अवतार हैं । कुछ पाने की आशा में बहुतेरे सब कामधाम छोड़ इनके हंसने पर हंसते हैं और रोने पर रोते हैं । मतलब इनको जो भाए वही फैन्स को करना पड़ता है । एक बार जिला जेल में तौल वाला कम्बल बंटवाए । बांट कर जब चले गए तो कैदी पहुंचे जेलर के पास और बोल पड़े-हुजूर दो घण्टे के लिए बाहर कर दो, लौट कर आ जाएंगे । जेलर पूछा-क्यों ? तो कैदी बोल पड़े-कम्बलदाता के दिए गए कम्बल ओढ़ा कर दो झापड़ लगा के आते हैं । कारण यह था कि कैदियों को जो कम्बल मिला था, उसे ओढ़ने पर खुजली होने लगी थी । वह फोम का कम्बल था ।
माननीय बांटने से पहले कम्बल देख लें-
सरकारी हों या राजनीति के माननीय । वे मंच पर अतिथि-मुख्य अतिथि बनने से पहले कम्बल की क्वालिटी जांच लें । झुर्रीदार चेहरे को कुछ ऐसा कम्बल दें कि खुशी में उनकी एकाध झुर्री कम हो सके । प्रायः जो कम्बल प्रायः बांटा जाता है पहली ही बार झटकने पर उसका रेशा-रेशा गठबन्धन वाली पार्टी की तरह अलग-अलग होने लगता है।
'कम्बल-अवतार उदारमनाओं' के दर्शन-उपदेश का है यह दो महीना---
सलिल पांडेय
मिर्जापुर: हिंदी साहित्य में निम्न तबके के दर्द से वाकिफ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद्र ने मौसम की मार झेलते एक बेबस किसान को पूस महीने में तड़पते देखा तो तीन रुपए के कम्बल का इंतजाम न कर पाने के वाकए को इस कहानी में चित्रित किया । इस कहानी का मुख्य पात्र हलकू पूस की रात में जबरा कुत्ते के साथ खेत की रखवाली करता तो है लेकिन कम्बल के रूपए साहूकार के ले लेने से वह कम्बल नहीं खरीद सका । ठंडक के चलते नीलगायों से खेत की रखवाली नहीं कर सका । जब वह पूस की रात में खेत चरते जानवरों की ओर घास-फूस की अलाव छोड़कर जाता तो शीतलहरी से हिम्मत न पड़ती और हलकू फिर अलाव के पास लौट आता रहा ।
उस जमाने में 3 रुपए का कम्बल--
लगभग सवा सौ साल पहले प्रेमचंद्र के जमाने में कम्बल 3 रुपए का रहा होगा, क्योंकि उन्होंने इसकी कीमत इतनी ही लिखी है । सवा सौ साल पहले के अन्य वस्तुओं के मूल्य चाहे कई हजारों में हो गया हो लेकिन हलकू वाला कम्बल अभी भी 50-60 रुपए में ही मिल रहा है ।
क्योंकि 'महानुभावलोग' इतने का ही कम्बल बांट रहे हैं---
पूस-माघ का महीना बहुतों को 'महानुभाव' 'प्रख्यात समाजसेवी', 'उदारमना' आदि से अलंकृत होने का महीना होता है । वे 50-60 रुपए का थोक में कम्बल जुटातेे हैं । इसके बाद बड़ा सा जलसा, महोत्सव, सेवा कैम्प आदि लगता है । बड़ा सा मंच शोभायमान होता है । क्लास वन और क्लास टू श्रेणी के लोग बुला लिए जाते हैं तथा फोर्थ श्रेणी का यह कम्बल बांटा जाता है । खूब तालियां बजती हैं । फोटोग्राफर भी मजबूर होते हैं । एक तो ड्यूटी, दूसरे एकाध कम्बल की व्यवस्था का मामला । साथ में कुछ दान-दक्षिणा के बल पर ये 'कम्बल अवतारी भगवान' छा जाते हैं जिले-जंवार में । सोशल मीडिया के बल देश-विदेश भी यश-कीर्ति लहराने लगती है।
तौल वाला कम्बल भी--
विगत सालों में एक 'फैन्स भाई' (ये भाई एक एसोसिएशन के नामी हस्ती हैं) के स्वयंभू अवतार हैं । कुछ पाने की आशा में बहुतेरे सब कामधाम छोड़ इनके हंसने पर हंसते हैं और रोने पर रोते हैं । मतलब इनको जो भाए वही फैन्स को करना पड़ता है । एक बार जिला जेल में तौल वाला कम्बल बंटवाए । बांट कर जब चले गए तो कैदी पहुंचे जेलर के पास और बोल पड़े-हुजूर दो घण्टे के लिए बाहर कर दो, लौट कर आ जाएंगे । जेलर पूछा-क्यों ? तो कैदी बोल पड़े-कम्बलदाता के दिए गए कम्बल ओढ़ा कर दो झापड़ लगा के आते हैं । कारण यह था कि कैदियों को जो कम्बल मिला था, उसे ओढ़ने पर खुजली होने लगी थी । वह फोम का कम्बल था ।
माननीय बांटने से पहले कम्बल देख लें-
सरकारी हों या राजनीति के माननीय । वे मंच पर अतिथि-मुख्य अतिथि बनने से पहले कम्बल की क्वालिटी जांच लें । झुर्रीदार चेहरे को कुछ ऐसा कम्बल दें कि खुशी में उनकी एकाध झुर्री कम हो सके । प्रायः जो कम्बल प्रायः बांटा जाता है पहली ही बार झटकने पर उसका रेशा-रेशा गठबन्धन वाली पार्टी की तरह अलग-अलग होने लगता है।

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