10 जनवरी (पौष पूर्णिमा). से शुरू होगा स्नान-पर्व

रूपांतरण का समय है माघ महीना: मां विंध्यवासिनी की अनन्त कृपा रहे ।------
  मिर्जापुर। विंध्य दर्शनार्थी परिषद की एक बैठक में माघ महीने में कुंभ-स्नान की महत्ता पर चिंतन किया गया तथा इसकी वैज्ञानिकता पर शोध पत्र पढा गया । कहा गया कि शास्त्रों में आध्यात्मिक दृष्टि से माघ महीने में पवित्र नदियों में स्नान एवं पूजन की जो महिमा कही गयी है, उंसके बहुआयामी लाभ हैं । जहाँ शास्त्रों में माघ माह के तप को अश्वमेध यज्ञ एवं पौण्डरीक यज्ञ के साथ मोक्ष, विष्णुपद की प्राप्ति वाला बताया गया है, वहीं आधुनिक शोधों में उत्तम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य वाला महीना कहा गया है । इसी के साथ शीतकाल के इस ऋतु में स्नान एवं पूजन से प्रकृति के साथ तादाम्य बनाने का भी अवसर मिलता है ।
    आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण की रचना के पूर्व ही जिन दो महीनों में प्रात:काल स्नान एवं श्रीहरि के पूजन का चर्चा की है, उसमें पहला माह माघ ही है । दूसरे पर चैत्र स्नान का उल्लेख है । माघ महीने में स्नान के महत्त्व की एक कथा का भी उल्लेख है। राजा सुमति और सत्यवती का पूर्वजन्म दूषित था लेकिन अनजाने में वशिष्ठ ऋषि के आश्रम पर जाकर स्नान-पूजन से वे अगले जन्म में राजा हुए । आशय स्पष्ट है कि इस महीने में प्रयाग में जुटने वाले सन्तों के सानिध्य से रूप-स्वरूप तथा आचरण में बदलाव आता है ।  गोस्वामी तुलसीदास ने भी 'माघ मकरगत रबि जब होई तीरथपतिहिं आव सब कोई' चौपाई में माघ माह की महत्ता पर पूरा जोर डाल दिया । वैज्ञानिक एवं खगोलीय दृष्टि से देखा जाए तो माघ महीने में प्रयाग के संगम पर सूर्य की किरणों का जल पर अद्भुत असर पड़ता है । जल में अमृत-तत्व की उत्पत्ति होती है । माघ महीने का कृष्ण पक्ष हेमंत तो शुक्ल पक्ष शिशिर ऋतु है । शीतकाल के इस यौवनकाल में स्नान से शरीर के रस-रसायनों में यौवनकाल जैसा तेज प्राप्त होता है । जो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाता है । सूर्यनारायण दक्षिणायण से उत्तरायण होते हैं । मेडिकल साइंस की दृष्टि से इस अवधि में सूर्य की किरणों का सेवन अति लाभकारी है ।
    आध्यात्मिक ऋषियों ने इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए पौष मास की पूर्णिमा से माघ मास की पूर्णिमा तक पवित्र नदियों में स्नान एवं भगवान के पूजन का उल्लेख किया है । प्रयाग में भरद्वाज ऋषि ने इसी अवधि में संगम स्नान के लिए आए याज्ञवल्क्य ऋषि से अपनी अज्ञानता को दूर करने की प्रार्थना की और याज्ञवल्क्य ऋषि ने श्रीहरि स्वरूप भगवान श्री राम की महिमा से उन्हें परिचित कराया था । श्रीराम के प्रति भक्ति का फल ही था कि वनगमन के समय निकले भगवान श्रीराम भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर आए थे । ब्रह्मपुराण में माघ महीने में स्नान-काल की अवधि अरुणोदय (प्रातःकाल) कही गई है । इस महीने में आस्थावान जो लोग नियमित रूप से स्नान करते हैं, उनके लिए विशेष रूप से यह कहा गया है । इसी पुराण में कहा गया है कि जो भगवान कृष्ण का ध्यान कर इस अवधि में स्नान करता है, वह देवपूजित होता है । पद्मपुराण में कहा गया है कि अशक्त व्यक्ति को भी कम से कम तीन दिन माघ माह में सूर्योदय के समय पवित्र नदियों में स्नान करना चाहिए । प्रयाग के संगम में स्नान गङ्गा-सागर स्नान की तरह फलदायी है । नारद पुराण में होम-हवन का विधान बताया गया है । हवन में तिल के प्रयोग से अग्नि का प्रज्ज्वलन लाभदायी है । इस अवधि में दान की भी महिमा है जिसमें गर्म वस्त्रों आदि के साथ तिल के दान का विशेष उल्लेख है । तिल पदार्थ में एक चौथाई शर्करा (चीनी या गुड़) और तीन चौथाई तिल होना चाहिए । माघ महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक की अवधि भी नवरात्र व्रत की तरह है । लौकिक रूप से इसे गुप्त नवरात्र कहते हैं   इस समय ज्ञान की शक्तियां अज्ञान के महिषासुर का वध करती हैं । 
    बैठक में मां विंध्यवासिनी का नियमित दर्शन करने वालों में जयराम शर्मा, शिवपूजन तिवारी, जलज नेत, साकेत पांडेय, कमल किशोर, बबूले सोनकर, मनीष शर्मा, विनय यादव, नन्हें केसरवानी आदि थे ।
   

सलिल पांडेय, अध्यक्ष, विंध्य दर्शनार्थी परिषद, मिर्जापुर 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ