वसन्त पंचमी माता सरस्वती की जयंती का पर्व

'बुद्धिं देहि, यशो देहि, कवित्वं देहि देहि मे ।
मूढ़त्वं च हरेत्-देवि त्राहि^ मां शरणागतं ।।
-- मूर्खता ^रक्षा--
( अर्थ- हे देवि ! आप मुझे बुद्धि दें, कीर्ति दें, कवित्वशक्ति (सुमधुर वचन) दें और मेरी मूर्खता का नाश करें । आप मुझ शरणागत की रक्षा करें ।) 
उक्त श्लोक का अपनी सुविधानुसार पाठ करें । न्यूनतम 11 बार से लेकर जो संभव हो ।
वसन्तपंचमी के दिन पूजन--
अधिकतम 2 बजे तक मां सरस्वती की प्रतिमा का पूजन कर चित्र के पास पुस्तक, कलम और वाद्ययंत्र रखें । मां सरस्वती को लगाए चंदन इन पदार्थों पर भी लगाएं ।
   सरस्वती की प्रतिमा को यथा संभव श्वेत कमल, वस्त्र में श्वेत बेहतर अन्यथा पीला भी पहनाया जा सकता है । खुद पीला पहनें ।
सरस्वती प्रसन्न कैसे और रूठती कैसे हैं ?---
जिह्वा सरस्वती का घर है और झूठ जिह्वा का कूड़ा है । जहां कूड़ा रहता है वहां इंसान नहीं बैठ सकता तो मां सरस्वती कैसे बैठेगी ? अतः जो जितने समय झूठ बोलता है तत्काल उतने समय जिह्वा से सरस्वती विदा हो जाती हैं । 
   इसके अलावा गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है- चरित्र से दूषित, फरेबी, तिकड़म से साधन और शक्ति सम्पन्न व्यक्ति की प्रशंसा करने से सरस्वती नाराज होती हैं । 'कीन्हे प्राकृत जे गुन गाना, ता धुनि लागि गिरा पछिताना'-मानस, बालकांड,11वीं चौपाई ।
नाराजगी का फल---
सरस्वती जब नाराज होती हैं तो उस व्यक्ति के घर से बाहर चली जाती हैं लिहाजा उसकी आने वाली पीढ़ी मूर्ख, आलसी, उद्यम विहीन तथा अन्यान्य दोषों से भर जाती है । 
सरस्वती की कृपा के लिए अपने से बड़ी उम्र के किसी व्यक्ति को अनर्गल अपमानित नहीं करना चाहिए । बल, धन, पद और रुतबे के चलते अपमानित और आहत करने से सरस्वती को पीड़ा होती है ।
वसन्त पंचमी क्यों ?-- 
ब्रह्मा की पत्नी और पुत्री दोनों का आशय स्पष्ट है।  जब ज्ञानार्जन का समय होता है और ज्ञान का पोषण किया जाता है तब सरस्वती पुत्री के समान होती हैं तथा जब उसी ज्ञान से आजीविका अर्जित कर जीवनचर्या चलती है तब सरस्वती पत्नी की तरह होती हैं ।
    माघ के शुक्लपक्ष से मौसम में ठंडक कम तथा गर्मी का दस्तक होता है । इसीलिए लोक-कहावत है कि 'आधे माघे कांभर कांधे । आशय कि आधा माघ बीत जाने पर कम्बल शरीर से उतर कर कंधे पर आ जाता है ।
     वातावरण आधे ठंडक तथा आधी गर्मी का हो जाता है । रात ठंडी और दिन गर्म होने लगता है । महादेव की जटा में गंगा की ठंडक तथा चंद्रमा की गर्मी दोनों है । हर इंसान को ठंडक और गर्म की जरूरत है । मस्तिष्क ठंडा रहे तथा रक्त गर्म रहे । रक्त का गर्म होना कर्मठता का सूचक जबकि मस्तिष्क का ठंडा होना तनावरहित जीवन का सूचक है । अतः माता सरस्वती को सकारात्मक भाव से प्रसन्न करने का पर्व है वसन्त पंचमी ।
                        सलिल पांडेय, मिर्जापुर

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