रजनीकांत अवस्थी
शिवगढ़/रायबरेली: क्षेत्र की ग्रामसभा पिपरी में अयोध्या धाम से पधारे सन्त शिरोमणि श्री श्री 1 हजार 8 नृत्यगोपाल दास के शिष्य राधेश्याम शास्त्री की भागवत कथा के प्रथम दिवस में धुंधकारी व गोकर्ण जन्म की कथा सुनाई गई।
आपको बता दें कि, भगवत चर्चा के दौरान राधेश्याम शास्त्री जी महाराज ने बताया कि, पौराणिक काल में तुंगभद्र नदी के किनारे रम्य नगर था। उस नगर में आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था। आत्मदेव की पत्नी सुंदर तो थी लेकिन हठ करना भी उसे पसंद था। उसके कोई संतान नहीं थी। जब आत्म देव तथा उसकी पत्नी की युवावस्था ढलने लगी तो, 1 दिन आत्मदेव दुखी होकर, घर से चले गए, चलते चलते वे एक तालाब के पास पहुंचे। वहां रुककर वे विश्राम करने लगे। उसी समय उस तालाब के पास एक सन्यासी आए। आत्मदेव ने आपबीती कह सुनाई। सन्यासी ने कहा कि, हे! ब्राम्हण, तुम्हारे भाग्य में संतान सुख नहीं है। फिर भी मैं तुम्हें अपने योग बल से एक संतान प्रदान करूंगा। सन्यासी ने आत्म देव को एक फल देकर कहा कि, योग शक्ति से संपन्न इस फल को अपनी पत्नी को खिला देना।
फल लेकर आत्मदेव प्रसन्न होकर अपने घर चला आया और अपनी पत्नी को पूरा वृत्तांत सुनाकर फल दे दिया। उसकी पत्नी ने कहा कि, वह फल को खा लेगी। आत्मदेव उसके बाद कुछ दिन के लिए प्रवास पर चला गया। आत्मदेव के जाने के बाद उसकी पत्नी ने सोचा यदि वह इस फल को खा लेगी तो उसके गर्भ में बच्चा आ जाएगा, पेट फुल कर बड़ा हो जाएगा। चलना फिरना आहार विहार आदि सभी जाते रहेंगे। 9 महीने तक कष्ट सहन करना पड़ेगा और फिर प्रसव का कष्ट तो मुझसे सहा ही नहीं जाएगा ऐसा उसने सोचा। उसने यह भी सोचा कि, हो सकता है प्रसव के कष्ट से उसके प्राण ही निकल जाएं। बच्चे का लालन-पालन भी तो एक कष्टकर कार्य है। वह यह कैसे कर पाएगी। यह सब सोचकर उसने फल को अपनी गाय को खिला दिया। अपने पति के वापस आने पर उसने झूठ बोला कि, उसने फल खा लिया था। समय बीतता गया। तब किसी को शक न हो इसलिए अपनी छोटी बहन जोकि, गर्भ से थी, को अपनी समस्या बताई तो छोटी बहन ने कहा कि, वह अपनी संतान को चुपचाप उसे लाकर दे देगी।
छोटी बहन के पुत्र होने पर वह उसे अपनी बड़ी बहन को दे गई और आत्म देव ने यही समझा कि, उसका पुत्र हुआ है। उस लड़के का नाम धुंधकारी रखा गया। कुछ काल बाद ब्राह्मण की गाय ने एक सर्वांग सुंदर स्वर्ण के समान रंग वाले दिव्य पुत्र को जन्म दिया। गाय के पुत्र का नाम गोकर्ण रखा गया, इस प्रकार से गोकर्ण का जन्म हुआ।
इस इस दिव्य कथा का मुख्य यजमान रिटायर्ड दरोगा विजय नारायण अवस्थी राकेश बाबू तिवारी, सुनील शुक्ल के साथ-साथ सैकड़ों की तादाद में श्रद्धालु मंडप के नीचे बैठकर रसास्वादन कर रहे थे।
©कॉपीराइट का उल्लंघन दंडनीय अपराध है।
शिवगढ़/रायबरेली: क्षेत्र की ग्रामसभा पिपरी में अयोध्या धाम से पधारे सन्त शिरोमणि श्री श्री 1 हजार 8 नृत्यगोपाल दास के शिष्य राधेश्याम शास्त्री की भागवत कथा के प्रथम दिवस में धुंधकारी व गोकर्ण जन्म की कथा सुनाई गई।
आपको बता दें कि, भगवत चर्चा के दौरान राधेश्याम शास्त्री जी महाराज ने बताया कि, पौराणिक काल में तुंगभद्र नदी के किनारे रम्य नगर था। उस नगर में आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था। आत्मदेव की पत्नी सुंदर तो थी लेकिन हठ करना भी उसे पसंद था। उसके कोई संतान नहीं थी। जब आत्म देव तथा उसकी पत्नी की युवावस्था ढलने लगी तो, 1 दिन आत्मदेव दुखी होकर, घर से चले गए, चलते चलते वे एक तालाब के पास पहुंचे। वहां रुककर वे विश्राम करने लगे। उसी समय उस तालाब के पास एक सन्यासी आए। आत्मदेव ने आपबीती कह सुनाई। सन्यासी ने कहा कि, हे! ब्राम्हण, तुम्हारे भाग्य में संतान सुख नहीं है। फिर भी मैं तुम्हें अपने योग बल से एक संतान प्रदान करूंगा। सन्यासी ने आत्म देव को एक फल देकर कहा कि, योग शक्ति से संपन्न इस फल को अपनी पत्नी को खिला देना।
फल लेकर आत्मदेव प्रसन्न होकर अपने घर चला आया और अपनी पत्नी को पूरा वृत्तांत सुनाकर फल दे दिया। उसकी पत्नी ने कहा कि, वह फल को खा लेगी। आत्मदेव उसके बाद कुछ दिन के लिए प्रवास पर चला गया। आत्मदेव के जाने के बाद उसकी पत्नी ने सोचा यदि वह इस फल को खा लेगी तो उसके गर्भ में बच्चा आ जाएगा, पेट फुल कर बड़ा हो जाएगा। चलना फिरना आहार विहार आदि सभी जाते रहेंगे। 9 महीने तक कष्ट सहन करना पड़ेगा और फिर प्रसव का कष्ट तो मुझसे सहा ही नहीं जाएगा ऐसा उसने सोचा। उसने यह भी सोचा कि, हो सकता है प्रसव के कष्ट से उसके प्राण ही निकल जाएं। बच्चे का लालन-पालन भी तो एक कष्टकर कार्य है। वह यह कैसे कर पाएगी। यह सब सोचकर उसने फल को अपनी गाय को खिला दिया। अपने पति के वापस आने पर उसने झूठ बोला कि, उसने फल खा लिया था। समय बीतता गया। तब किसी को शक न हो इसलिए अपनी छोटी बहन जोकि, गर्भ से थी, को अपनी समस्या बताई तो छोटी बहन ने कहा कि, वह अपनी संतान को चुपचाप उसे लाकर दे देगी।
छोटी बहन के पुत्र होने पर वह उसे अपनी बड़ी बहन को दे गई और आत्म देव ने यही समझा कि, उसका पुत्र हुआ है। उस लड़के का नाम धुंधकारी रखा गया। कुछ काल बाद ब्राह्मण की गाय ने एक सर्वांग सुंदर स्वर्ण के समान रंग वाले दिव्य पुत्र को जन्म दिया। गाय के पुत्र का नाम गोकर्ण रखा गया, इस प्रकार से गोकर्ण का जन्म हुआ।
©कॉपीराइट का उल्लंघन दंडनीय अपराध है।





0 टिप्पणियाँ