कचहरी बाबा तो कहते थे-'पगले (जो बिना कुछ पाए सिर्फ जहर पीकर गले से लगा ले) की बारात---
मिर्जापुर । प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर आध्यात्मिक राजधानी काशी प्रान्त के अंतर्गत शामिल विंध्यक्षेत्र में देवों के देव, हर समस्याओं के समाधान के देव तथा यहां तक कि पागलों के देव महादेव के परिणय-उत्सव के साथ सृष्टि की 'अभिनव रचना' के अवसर पर उल्लास-रूप लिए बारात निकालने की तैयारियां शुरू हो गई हैं । इसके अलावा शिवपूजन एवं अर्चन, साज-सजावट को अंतिम रुप दिया जा रहा है ।लखनऊ में महन्थ देव्या गिरि तो विंध्यक्षेत्र में प्रशासनिक अमले की बारात---
लखनऊ के मनकामेश्वर पीठ की परम विदुषी महन्थ देव्या गिरि सतयुग में निकले शिवबारात का पौराणिक स्वरूपों के साथ हफ़्तों से तैयारी में सलंग्न हैं तो मिर्जापुर में DM श्री सुशील कुमार पटेल और SP डॉ धर्मवीर सिंह के नेतृत्व में प्रशासन एवं पुलिस महकमा बारात के सौम्य, सुशीलमय तथा धर्मयुक्त बनाने के लिए नगर में कदमताल करने में लगा है ताकि सौम्य देव के बारात में कोई ऐसा न कर दे कि लय के देवता महादेव को रौद्र रुप धारण करना पड़े ।
शिवपूजन में सावधानियां---
धर्मग्रन्थों में शिवरात्रि के पर्व पर महादेव के शिवलिंग की पूजा-अर्चना श्रद्धालु करते हैं। शिव और सूर्य के पूजन में शंख से स्नान वर्जित बताया गया है । इसी के साथ शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने का विधान बेलपत्र को उल्टा चढ़ाने के साथ बेलपत्र जिधर अर्घा हो, उधर ही होना चाहिए । वह हर मंदिरों में उत्तर दिशा में होता है । यानि डंडी दक्षिण दिशा में रहनी चाहिए ।
एक एक बेलपत्र चढ़ाए ।---
बेलपत्र एक साथ हाथ में लेकर चढ़ाने की जगह एक एक बेलपत्र 'ऊँ नमः शिवाय' और महिलाएं खासकर माता बनने की प्रक्रिया से गुजर रही महिलाएं सिर्फ 'शिवाय नमः' मानसिक रूप से जपते हुए चढ़ाएं ।
मानसिक पूजा सर्वोत्तम--
पूजा का अर्थ ही खुद के जीवन को पूजनीय बनाने के लिए है । इसके लिए एकाग्रता की जरूरत पड़ती है । यदि पूजा में कुछ भी नहीं तो भी भोलेनाथ पूजा स्वीकार करते हैं ।
सिर्फ महादेव ही हैं जो एक लोटे जल से प्रसन्न होते हैं-
देवताओं में महादेव ही है जो तरलता एवं कोमलता के प्रतीक जल चढ़ाने से प्रसन्न होते हैं । निरन्तर प्रवाहमान रहने, प्यास बुझाने, लोकहित में निरन्तर नीचे जाने के साथ जल ही सर्वाधिक कोमल माना जाता है । इसलिए कुछ भी नहीं हो तो आज्ञाचक्र पर महादेव का ध्यान करते हुए एक लोटा जल चढ़ाएं । दूध की जगह कामधेनु गाय का स्मरण करते हुए उसका दूध, मानसरोवर का ध्यान कर वहां का पुष्प तथा इसी प्रकार अन्य सामाग्री भी चढ़ाते जाएं । संभवतः लगेगा कि महादेव आनन्द बरसा रहे हैं ।
विंध्यक्षेत्र में विशेष पूजा- -
महादेव को प्रसन्न करने के लिए यद्यपि हर शिवमंदिर में विशेष तामझाम, गीत-संगीत, रुद्राभिषेक, भंडारे आदि की तैयारियां हैं लेकिन पौराणिक विंध्याचल के पास स्थित शिवपुर तथा नगर के तारकेश्वर मंदिरों पर प्रातः से ही अटूट जन-श्रद्धा देखी जा सकेगी । इसी तरह लोकेश्वरनाथ पहाड़ी (बरकछा) में गोवा प्रान्त के नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर के अधिष्ठाता स्वामी राजचैतन्य महाराज द्वारा संकल्पित अतिरुद्र महायज्ञ में भक्ति-भाव का मूर्त रूप दिखाई पड़ेगा। इसी तरह लोकनाथ की उस ऊंचाई पर जहां से चुनार का किला भी दिखता है, वहां भी लाखों भक्तों का डेरा लगेगा । भैरोकुंड पर विद्वान सन्त स्वामी प्रबुद्धानन्द मां काली के साथ देश के चारों ज्योतिष्पीठों से भी बड़े 'श्रीयंत्र' की विशेष उपासना करेंगे ।
शिवबारात भी निकलेगी---
सर्वाधिक प्राचीन शिवबारात इमलीमहादेव मुहल्ले से निकलकर नारघाट, दूसरी बारात बरियाघाट के पंचमुखी मंदिर से निकलकर नगर भ्रमण करते फिर वहीं तो बूढ़ेनाथ से पालकी यात्रा वहाँ से शुरू होकर विभिन्न मुहल्लों से होते पुनः मंदिर आएगी ।
कचहरी बाबा महादेव को 'पगला' बोलते थे--
संतों के सम्राट माने गए 1986 में ब्रह्मलीन हुए चक्रवर्ती सम्राट अमरगढ़ किला, कचहरी बाबा शिवरात्रि पर्व पर अपने अनुयायियों से बोलते थे-'इक्का ला और पगला के यहां ले चल' लोग पूछते बाबा किस पगला के यहाँ तो बोलते-अरे, तारकेश्वर में ले चल, वहां पगला (तारकेश्वर महादेव) है न' । इन्हीं कचहरी बाबा को देवरहा बाबा आध्यात्मिक सम्राटों का सम्राट कहते थे ।
नगर विधायक तीन कन्याओं की शादी कराएंगे--
तीर्थ पुरोहित एवं नगर विधायक इसी दिन तीन कन्याओं का चयन कर तथा उन्हें काली, लक्ष्मी और सरस्वती नाम देकर बाकायदा बारात निकलवाते हैं, पाँवपूज कर विवाह कराते तथा भण्डारा करते हैं । इस प्रकार यह पर्व विंध्यक्षेत्र के लिए अनुपम, अकथनीय तथा अवर्णनीय होता है ।
अंतिम स्नान पर्व---
माघ महीने से शुरू स्नान का अंतिम पर्व है । माँ गंगा जब विंध्य क्षेत्र में आती हैं तो यहां पर्वत देख उन्हें अपने पिता की याद आती है । अपने उद्गम से पर्वत को यहीं स्पर्श करती हैं । यहां से जाते वक्त डीएम बंगले पर सबसे लंबी पश्चिमवाहिनी गंगा यहीं होती हैं। यहां स्पर्श करने पर दक्षिण में कुश से पूजा और उत्तर में बालू-वेदिका बनाकर पूजा शुरू हुई । इसे कौथिमी और जेमिनी शाखा का नाम दिया गया ।
-सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
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