कृषि क्रांति के प्रणेता और कम्प्यूटर क्रांति के वैज्ञानिक हैं महादेव तथा उनकी अर्धांगिनी

सरल, सौम्य, उद्यमशील, जीवनभर अड़भंगी और भिक्षुक, थोड़े से जल से प्रसन्न होने वाले किसानों की तरह है महादेव का पूरा महात्म्य । इसी तरह कम्पयूटर क्रांति के वैज्ञानिक भी हैं टेक्नोलाजी के प्रणेता के साथ पतंजलि के योग सिद्धांत के पोषक भी महादेव--
कृषि संस्कृति के लिए सिंचाई के इंजीनिर---
कृषि को लहलहाने के लिए जिन जिन पदार्थों की जरूरत है, सब महादेव में समाहित है । किसान को पानी के लिए सिंचाई बांधों पर निर्भर रहना पड़ता है लिहाजा महादेव ने अपने शीश पर सिंचाई डैम बना लिया है ।
यह डैम बैराज की तरह है--
बांध का कैचमेंट एरिया विष्णु जी के श्रीचरणों तथा ब्रह्मा के कमंडल तक है । बेगवती जल धारा को अपने शीश पर रोक कर उसे बैराज बना दिया और तीन बूंद उस बैराज से छोड़ा तो एक धारा गंगा, दूसरी सरस्वती और तीसरी मंदाकिनी की धारा बनी जिसे तमाम बांधों का फीडर चैनल कह सकते है जिससे कैनाल, रजवाहा, माइनर नहरें निकली । यानि कई नदियां अस्तित्व में आगे चलकर बनीं । पूरी धरती उनके कमांड एरिया में है ।
जोताई के लिए नन्दी--
कृषिभूमि की जोताई के लिए महादेव के पास बैल के रूप में नन्दी और हल के रूप में त्रिशूल है । यूरिया के रूप में भस्म, कीटनाशक के रूप में गले में सर्प, खेत की मिट्टी के रूप में शरीर में लिपटा भभूत है ।
ऊर्जा के रूप में आंखें---
यह कृषि-विज्ञान का विषय है कि वनस्पतियों में वृद्धि सूर्य किरणों से तथा उसमें पौष्टिकता चन्द्र किरणों से आती है। सो महादेव की दाहिनी आंख सूर्य और बाई आंख चन्द्रमा है । द्वितीया का चन्द्रमा पूर्णिमा तक वृद्धि ही फसलों की निरन्तर वृद्धि का यह सूचक है
पर्वतपुत्री से विवाह---
प्राकृतिक तत्वों के संरक्षक हिमालय की पुत्री पार्वती ही जीवन देने वाली भूमिजा है । भूमि से प्रकट फसलें ही प्राणियों के जीवन का आधार है । अतः उस उपज को पत्नीवत खलिहान तक लाकर उसका श्रृंगार जैसे थ्रेसरिंग आदि का कार्य माना जाना चाहिए । सन्तान के रूप में कार्तिकेय और गणेश जी उनके अंश समस्त धरतीवासी मनुष्य एवं अन्य जीव-जंतु हुए ।
कम्प्यूटर क्रांति के रूप में इंजीनियर---
अर्धनारीश्वर स्वरूप उनका इसका प्रमाण है । आधा हिस्सा हार्डवेयर और आधा साफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में तो तीसरा नेत्र इंटरनेट है । 
पतंजलि का योग ---
दाहिनी नासिका सूर्य नाड़ी (इड़ा) और बाई (पिंगला) तो सप्तचक्रों मूलाधार, स्वाधिष्ठान, कुंडलिनी, अनहत, विशुद्ध, आज्ञाचक्र एवं सहस्रार को जागृत करना है जो सुप्तभाव में है । महादेव की आधी खुली और आधी बंद आंखों की तरह सुषुम्ना नाड़ी को जागृत किया जा सकता है । फिर तो शिवत्व की प्राण-प्रतिष्ठा कर पतंजलि, वाल्मीकि, हनुमान जी की तरह कोई भी बन सकता है ।
दैत्यों का संहार---
सुषुम्ना जागृत होते गंदगियों से भरे शरीर में विद्यमान हानिकारक बीमारी रूपी दैत्यों का संहार स्वतः होने लगेगा । मानसिक धरातल पर काम, क्रोध, मोह और लोभ सबका हनन होने लगेगा । मर्यादापुरुषोत्तम श्रीसीताराम हृदय में आ जाएंगे । फिर तो जब भी हृदय पटल पर देखा जाएगा तो हनुमान के रुप में सीता और रामजी दिखेंगे ।
दशानन का बध---
दस इंद्रियों वाले शरीर में दस तरह की बातें करना, छलछद्म करना और शांति रूपी सीता के अपहरण के खिलाफ त्रेतायुग का आंदोलन शुरू हो जाएगा ।  भौतिकता के प्रतीक सोने की लंका पाने का भाव जल जाएगा और ध्वस्त हो जाएगा ।
©कॉपीराइट लेखकाधीन, लेखक का नाम हटाकर किसी अन्य का नाम जोड़ना दण्डनीय है।
                     -सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।

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