श्रीमद् भागवत के अंतिम दिवस में रुकमणी विवाह से सुदामा मित्रता के उल्लेख पर कथा का समापन।। Raebareli news ।।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है
शिवगढ़/रायबरेली: विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत पिपरी में श्रीमद्भागवत महापुराण के अंतिम दिन अयोध्या धाम से पधारे पंडित राधेश्याम शास्त्री ने सातों दिन की भागवत का महत्व बताते हुए रुकमणी विवाह से सुदामा मित्रता तक का उल्लेख किया।
       आपको बता दें कि, राधेश्याम शास्त्री जी महाराज ने रुकमणी रूपी जीवात्मा का अपने प्रभु प्रेम के प्रति बिरह का भाव दर्शाया, साथ ही यह भाव भी प्रकट किया गया। उन्होंने कहा कि, जैसे आत्मा की पुकार पर परमात्मा को प्रभु समस्त बंधनों से स्वतंत्र अपने कभी न टूटने वाले अपने सूत्रों से बांध लेते हैं।
     कथा का समापन करते हुए राधेश्याम शास्त्री जी ने कहा कि, राजा परीक्षित असुरक्षा से ग्रस्त थे, उनके समक्ष प्रतिक्षण मौत मुंह खोलें खड़ी थी, उन्होंने भागवत कथा श्रवण की परीक्षित की मुक्ति केवल हरि चर्चा या कृष्ण लीलाओं का स्मरण करने मात्र से नहीं हुई थी। श्री सुखदेव जी महाराज के द्वारा प्रभु के रूप को अपने अंदर जान लेने पर ही हुई। शास्त्रानुसार हृदय की ग्रंथि अर्थात अज्ञानता व सभी संसयो का नाश गुरु के द्वारा दिव्य नेत्र प्राप्त होने पर ही होता है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन का मोह बन्ध से नष्ट करने हेतु ही उसे यही कहा था कि, मैं तुझे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूं।
      दिव्य चक्षु से परमात्मा के स्वरूप का दर्शन करते ही उसकी समस्त उपाय बताए। परीक्षित को भी सुखदेव ने ब्रह्म ज्ञान प्रदान करते हुवे, ज्ञानचक्षु जागृत कर उनके लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया था। सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि, सुदामा श्री कृष्ण के बाल सखा थे सुदामा का अर्थ है जिसके अंदर समर्पण का भाव हो और आस्था अटल हो। सुदामा की ईश्वर के प्रति अटूट आस्था थी। भागवत कथा में चार वेद पुराण गीता एवं श्रीमद् भागवत महापुराण की व्याख्या का वर्णन किया गया है। राधेश्याम शास्त्री ने कहा कि, भगवान श्री कृष्ण जी के वात्सल्य प्रेम के अलावा विभिन्न लीलाओं का वर्णन कर वर्तमान समय में समाज में व्याप्त अत्याचार, अनाचार, कटुता, व्यभिचार को दूर कर सुंदर समाज निर्माण के लिए युवाओं को प्रेरित किया।
      सातों दिन में धुंधकारी कथा से आरंभ कर रासलीला, मथुरा गमन, दुष्ट कंस राजा के अत्याचार से मुक्ति के लिए कंस वध, कुब्जा उद्धार, रुक्मणी विवाह, शिशुपाल वध, सुदामा चरित्र का वर्णन कर लोगों को भक्ति रस में सातों दिन डुबोए रखा। 
     सुदामा और श्रीकृष्ण बलराम जी संदीपन ऋषि के आश्रम में शिक्षा लेते थे, सुदामा उदार मना थे श्री कृष्ण से मिलने की अभिलाषा चिरकाल तक उनके मन में रही,संदीपन मुनि के आश्रम से निकलने के पश्चात वह अपने गृहस्थ जीवन में लग गए किंतु श्री कृष्ण को भुला नहीं सके। उनसे मिलने की अभिलाषा ने और उनकी पत्नी व बच्चों के आग्रह करने पर वह श्री कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका कई दिनों की यात्रा करके पहुंचे। यात्रा से थके हुए मैले, कुचैले कपड़ों में द्वारपालों ने सुदामा जी को रोककर उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि, मैं श्री कृष्ण का मित्र हूं। किंतु द्वारपालों ने इसका उपहास बनाते हुए उन्हें मना कर दिया और सूचना लेकर श्री कृष्ण के पास पहुंचे जैसे ही श्रीकृष्ण ने सुना कि, सुदामा आए हैं वह नंगे पैर अपने राजमहल से दौड़ते हुए मिलने के लिए व्याकुल होकर चल दिए और उन्होंने अपने मित्र को गले लगाया। बैठा कर उनके चरणों को अपने नेत्रों से धुला सुदामा के सारे दुख दरिद्र को श्री कृष्ण जी ने उसी के साथ नष्ट कर दिया।
     श्री कृष्ण जी ने आदर सम्मान के साथ उनको खाली हाथ विदा किया। सुदामा जी अपने घर श्री कृष्ण का नाम लेते हुए पहुंच गए।किंतु जब वहां पहुंचे तो देखा कि, कुटिया महल का रूप ले चुकी थी। पत्नी रानी के स्वरूप में थी। बच्चे और पूरा  नगर संतृप्त था।
       सुदामा जी ने बहुत ही दबे स्वर में पूछा तो उनकी पत्नी ने झट ही उनका आदर सम्मान करते हुए बताया कि, आपके जाने के बाद आपके मित्र द्वारिकाधीश श्री कृष्ण जी ने यह सुंदर नगर बसाया है। किंतु सुदामा तो सुदामा है ऐश्वर्य प्राप्त होने के बाद भी सुदामा अनासक्त मन से भगवान के भजन में लगे रहे। इसी के साथ भागवत कथा को संपन्न करते हुए राधेश्याम शास्त्री ने कहा कि, जीवन को प्रभु चरणों में लगाए रखना चाहिए। कभी किसी के जीवन में कोई संकट नहीं आ सकता। इस अवसर पर 7 दिनों तक अनवरत कथा श्रवण कर रहे श्रोताओं ने राधे कृष्ण राधे कृष्ण के गगनभेदी जयकारे लगाए इन गगनभेदी जयकारों के बीच समूचा क्षेत्र कृष्ण में लग रहा था। सभी ने कृष्ण और रुक्मणी के विवाह में पर पूजन का कार्य भी किया शाखोच्चार गीत संगीत के साथ कथा का समापन हुआ। मुख्य यजमान रिटायर्ड दरोगा विजय नारायण शुक्ल व उनकी पत्नी केश कुमारी तथा रिटायर्ड शिक्षक गोविंद नारायण शुक्ला और उनकी पत्नी मधु शुक्ला ने आरती हवन पूजन किया। 
      आयोजक राजकुमार शुक्ला उर्फ राजू ने सभी श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 फरवरी को विशाल भंडारे के आयोजन की भी सूचना दी।
      इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला समेत सैकड़ों की तादात में क्षेत्र के प्रतिष्ठित, गणमान्य, आम नागरिक तथा जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

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