सात दिवसीय श्रीमद्भभागवत कथा के दूसरे दिन ओसाह में आस्था का उमड़ा जनसैलाब।। Raebareli news ।।

रजनीकांत अवस्थी
शिवगढ़/रायबरेली: विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत ओसाह में राजकीय विद्यालय के समीप स्थित सपा के बछरावां विधानसभा अध्यक्ष राकेश त्रिवेदी के प्रतिष्ठान एवं कार्यालय प्रांगण में बड़े ही हर्षोल्लास पूर्वक सात दिवसीय श्रीमद् भागवत के दूसरे दिन की कथा में हरीधाम खैरा वीरू से पधारें कथावाचक पंडित कृष्ण कुमार द्विवेदी ने अपनी अमृतवाणी बाड़ी से वैराग्य की साक्षात चूड़ामणि श्री सुखदेव जी महाराज का आज जन्म और कलयुग के प्रथम राज ऋषि श्री परीक्षित जी के जन्म की कथा बड़े ही विस्तार पूर्वक सुनाई।
       आपको बता दें कि, पंडित कृष्ण कुमार द्विवेदी ने कथा का शुभारंभ करते हुए कहा कि, कलयुग के प्रथम राजा श्री परीक्षित जी महाराज अनजाने में श्रमिक मुनि का अपमान किया। मरे हुए सर्प को उनके गले में डाला। उनके शिष्य श्रृंगी ऋषि ने श्री परीक्षित जी को 7 दिन में मरने का श्राप दे दिया। परीक्षित ने अपना घर-परिवार राज्य छोड़कर श्री सुखदेव जी की पावन शरण स्वीकार किया। तत्पश्चात परीक्षित जी ने सुखदेव जिसे 6 प्रश्न पूछे। पहला यह कि, जिस व्यक्ति की मृत्यु के दिन करीब हो ऐसे जीव को क्या करना चाहिए, श्री सुखदेव जी ने परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण के माध्यम से मुक्ति का मार्ग बताते हुए भागवत कथा का बड़ा मार्मिक ज्ञान प्राप्त कराया।
       सृष्टि विस्तारक भगवान के अवतार लेने के कारण को समझाते हुए भगवान ने कितने अवतार लिए और भगवान के परमधाम जाने के बाद धर्म किसकी शरण में गया विस्तार से कथा के बारे में उपस्थित श्रोताओं को बताया।
      पंडित कृष्ण कुमार द्विवेदी ने अपनी अमृतवाणी से कथा को विस्तार देते हुए बताया कि, भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति, सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है।
     शुकदेव महाभारत काल के मुनि थे। वे वेदव्यास जी के पुत्र थे। वे बचपने में ही ज्ञान प्राप्ति के लिये वन में चले गये थे। इन्होने ही परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनाया था। शुक देव जी ने व्यास जी से महाभारत भी पढा था और उसे देवताओ को सुनाया था। ये कम अवस्था में ही ब्रह्मलीन हो गये थे।
      शुकदेव के जन्म के बारे में यह कहा जाता है कि, ये महर्षि वेद व्यास के अयोनिज पुत्र थे और यह बारह वर्ष तक माता के गर्भ में रहे। पंडित कृष्ण कुमार द्विवेदी ने आगे बताया कि, कथा कुछ इस प्रकार है। भगवान शिव, पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। पार्वती जी को कथा सुनते-सुनते नींद आ गयी और उनकी जगह पर वहां बैठे एक शुक ने हुंकारी भरना प्रारम्भ कर दिया। जब भगवान शिव को यह बात ज्ञात हुई, तब उन्होंने शुक को मारने के लिये दौड़े और उसके पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुक जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागता रहा, भागते-भागते वह व्यास जी के आश्रम में आया और सूक्ष्मरूप बनाकर उनकी पत्नी के मुख में घुस गया और वह उनके गर्भ में रह गया। 
      ऐसा कहा जाता है कि, ये बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि, बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र कहलाये। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था।
      जन्म लेते ही ये बाल्यावस्था में ही तप हेतु वन की ओर भागे, ऐसी उनकी संसार से विरक्त भावनाएं थी। परंतु वात्सल्य भाव से रोते हुए श्री व्यास जी भी उनके पीछे भागे। मार्ग में एक जलाशय में कुछ कन्याएं स्नान कर रही थीं, उन्होंने जब शुकदेव जी महाराज को देखा तो, अपनी अवस्था का ध्यान न रख कर शुकदेव जी का आशीर्वाद लिया। लेकिन जब शुकदेव के पीछे मोह में पड़े श्री व्यास वहां पहुंचे तो सारी कन्याएं छुप गयीं। ऐसी सांसारिक विरक्ति से शुकदेव जी महाराज ने तप प्रारम्भ किया।
      कथा के अग्रिम पड़ाव में पंडित कृष्ण कुमार द्विवेदी बताते हैं कि, जिस जगह शुकदेव जी महाराज ब्रह्मलीन हुए थे वर्तमान समय में वह जगह हरियाणा में कैथल के गाॅंव सजूमा में है।
      इस मौके पर यजमान राकेश त्रिवेदी उर्फ आलू महाराज और उनकी धर्मपत्नी ग्राम प्रधान सुनीता त्रिवेदी, क्षेत्र पंचायत सदस्य मनोज त्रिवेदी, अनुज त्रिवेदी समेत सैकड़ों की संख्या में श्रोता मौजूद रहे।

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