मिर्जापुर। बाबा तुलसी ने लिखा कि 'का नहीं अबला कर सके, का नहीं सिंधु समाय । का नहीं पावक जारि सके, का नहीं कालहिं खाय।
यह चौपाई मंथरा के तिकड़म से राम को मिले वनवास के प्रसंग में लिखी गई है। लेकिन स्वाभिमान की धनी महिलाओं को कोरोना काले नाग की तरह डस रहा है और इस तरह की महिलाओं पर क्या क्या गुजर रही है, वह करुणान्त कहानी की तरह है ।टटहाई रोड और बुंदेलखंडी की महिलाएं
उक्त दोनों मुहल्ले की कतिपय महिलाएं 'बुंदेले हर बोलो के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' कविता छंद की पात्र लग रही है ।
हम माँगने के लिए ड्योढ़ी नहीं लांघेंगे
टटहाई मुहल्ले में एक मजदूर की पत्नी के घर चूल्हा बुझ गया था । उसको 3 छोटे बच्चे भी हैं । लोग सलाह दे रहे थे कि अन्नपूर्णा बैंक से मिलने वाली सामाग्री लेने चली जाओ लेकिन वह बोली-'मर जाऊंगी, पर घर से बाहर नहीं जाऊँगी ।' यही बात बुंदेलखंडी में कई परिवारों की स्वाभिमानी महिलाओं ने भी कही । किसी प्रकार मदद करने वाली टीम की महिलाओं ने दिन ढलने के बाद घर के अंदर ढक-तोप कर खाद्य सामाग्री पहुंचा कर उनकी इज्जत बचाई ।
इसके विपरीत का दृश्य
नगर के ही एक व्यक्ति ने प्रशासन से जाकर गुहार लगाई कि उसके पास कुछ खाने को नहीं है । सिटी मजिस्ट्रेट ने उसे खाद्य-किट दिलवाया । दूसरे दिन वह फिर उनके पास पहुंचा और बोला-'हुजूर, मोबाइल में पैसा नहीं है क्या करूँ ? बहुत जरूरी है । पैसा भरवा दीजिए । इसी तरह एक पत्रकार ने जरूरतमन्द महिला की खाद्य सामाग्री से भरपूर मदद की । दूसरे दिन वह फोन पर बोली-'सर, उज्ज्वला गैस ख्तम हो गया है और घर में चीनी नहीं है, इसका भी इंतजाम करा दीजिए ।
कुछ कोरोना को जैसे वरदान मान बैठे हैं
इस काल में कुछ में मुफ्तखोरी की आदत पड़ गई है । वे कहाँ कहां कुछ मिल रहा है, इसका पता लगाकर बहती गंगा में कायदे से हाथ धोने में लगे हैं ।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर
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