रावण वध के लिए शूर्णपखा ने आत्म-बलिदान किया है

रामचरितमानस में कैकेयी, मंथरा के साथ शूर्णपखा की महत्त्वपूर्ण भूमिका
राजनीतिज्ञ श्री गंगासागर दुबे राजनीति से इतर प्रखर विचारक के रूप में जब कोई प्रश्न रखते हैं तो बौद्धिक जगत में हलचल होने लगती है । रामायण सीरियल के  दौरान उन्होंने एक प्रश्न रखा-
शूर्णपखा श्रीराम के पास वासना से ओतप्रोत होकर आई थी।
  इस संबन्ध में विभिन्न रामायण-ग्रन्थों से निहितार्थ निकलता है कि यह लौकिक भाव है । जबकि शूर्णपखा श्री राम से विवाह नहीं बल्कि अपने ही भाई रावण से बदला लेना चाहती थी ।
कारण
    एक बार रावण शूर्णपखा के घर गया था । शूर्णपखा का पति विद्युतजिह्व श्रीहरि का उपासक था । श्री हरि की पूजा करते देख रावण चिढ़ गया था । रावण के लिए जब घर के अंदर पानी वगैरह लेने गई तब रावण उसके पति की हत्या कर भाग गया । इससे वह बहुत दुखी थी और रावण का विनाश चाहती थी ।
   'तुम सम पुरुष न मम सो नारी, यह संयोग विधि लिखा बिचारी'
 चौपाई में वह खुद कन्या नहीं नारी कहती है । नारी का आशय जिसका विवाह हो चुका है। श्रीराम को वटुक नहीं बल्कि पुरुष कह रही है।  अतः वह जानती है कि श्रीराम विवाहित है ।
वाल्मीकि रामायण में
     इसमें श्रीराम ने शूर्णपखा की प्रशंसा में वृद्धा शब्द का प्रयोग किया है । यहां इसकी व्याख्या *ज्ञानवृद्धा* के रूप में कही गई है ।
राम का वनगमन
    सभी जानते है कि राम रावण के वध के लिए वन नहीं गए थे । श्रीराम नारी-पीड़ा को दूर करने के इरादे से वन की ओर गए।  पहली नारी अहल्या और दूसरी सबरी । दोनों तत्कालीन समाज की पीड़िता नारी थीं ।
शूर्पणखा की प्लानिंग
    शूर्णपखा का किसी प्रकार श्रीराम से रावण का विरोध कराना था । सोची समझी योजना के तहत वह गई । जिसके बॉडी लैंग्वेज से श्रीराम ने समझ लिया तो  श्रीराम ने लक्ष्मण के पास भेजा । श्रीहरि के उपासक अपने पति की मौत का दंड दिलाना शूर्णपखा का प्रथम उद्देश्य था । यहीं से रावण के आतंक का पता श्रीराम को चलता है  और यहीं से श्रीराम ने रावण को *चुनौती* दी है ।
गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं
लछिमन अति लाघव सो नाक कान बिनु कीन्ह ।
ताके कर रावन कहं मनौ चुनौती दीन्ह ।।
     (अरण्यकाण्ड, दोहा 17)
श्रीराम को रावण ने नहीं बल्कि श्रीराम ने चुनौती दी है । शूर्णपखा नाक-कान (प्रतिष्ठा पर आघात) का मुद्दा लेकर जब रावण के पास गई है तो उसने रावण को कामी, दम्भी राजा कह फटकारा है । वाल्मीकि रामायण में विस्तार से उल्लेख है ।
कैकेयी, मंथरा और शूर्णपखा ने बड़ा काम किया है
   रामचरितमानस में उक्त तीनों नारियों ने खुद पर लांछन झेल कर श्रीराम को पूजनीय बना दिया है । मंथरा की जिह्वा पर सरस्वती का आना मंथरा के सौभाग्य का सूचक है । जिसके पास सरस्वती जाती हैं वह तो यशस्वी माना जाता है । खुद को त्याग कर राष्ट्र और समाज की रक्षा करना तो आत्म बलिदान है ।
   शूर्णपखा ने भी इशारे में रावण के विनाश के लिए कहा कि यह संयोग है कि मैं और आप मिलकर रावण का विनाश करेंगे । इसके बाद शूर्णपखा का रोल खत्म हो जाता है । 
शूर्णपखा का अर्थ
 जिसके नाखून सूप की तरह हो । सूप का काम 'सार सार को गहि रह्यो थोथा देई उड़ाय' होता है ।
                       -सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
©कापीराइट ऐक्ट के तहत छेड़छाड़ दंडनीय ।

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