"पनघट" कमल बाजपेई

◆पनघट उदास,
कभी यहीं छाँव तले, 
आने के वादे थे,
कोई नही पास,
पनघट उदास।
◆न जाने कहाँ गए राह के बटोही,
पहले क्यूँ आते थे,
कसमें क्यूँ खाते थे,
सुनता था बातें मैं, 
जब - जब वो आते थे,
बातों ही बातों में ताज चले जाते थे,
जीवन भर आने की बात कह जाते थे,
जाने क्यूँ न आते अब उनमे से कोई,
न जाने कहाँ गए राह के बटोही।
◆उनमे क्या प्यार था,
कैसे मैं जानू,
कहा नहीं कभी मुझसे,
कैसे मैं मानूँ,
होता मैं कौन उनका,
कहते यह बात,
पनघट उदास।
◆बहुत दिनों बाद एक उनमे से आया,
थका - थका बोझिल सा चेहरा मुरझाया,
बैठ गया छाँव तले धरती को देखा,
उंगली की कलम बना खींची एक रेखा,
रेखा में नाम लिखा उसने फिर "रेखा",
जाने के बाद उसके मैंने यह देखा,
आये न फिर कभी दोनो में कोई,
ना जाने कहाँ गए राह के बटोही।
◆देखूँ फिर मिलन उनका,
यही एक आस,
पनघट उदास।।
■Written by-कमल बाजपेई

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