रजनीकांत अवस्थी
बछरावां/रायबरेली: दशकों पहले जटायु राज गिद्ध के झुंडों से गुलजार रहने वाले आसमान आज इनकी उड़ानों से वीरान हो चुके हैं। गिद्धों की घटती संख्या और बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण का खतरा बढ़ता जा रहा है।
आपको बता दें कि, विकास क्षेत्र के बसंतपुर गांव के पास एक वृद्ध गिद्ध को ग्रामीणों ने देखा। कड़ी मशक्कत के बाद ग्रामीणों ने उसे पकड़कर वन कर्मियों के सुपुर्द किया है। ग्रामीणों की माने तो करीब तीन दशक पहले गिद्धों के झुंड दिखाई देते थे, पर अब पर्यावरण संतुलन में सहायक गिद्धराज जटायु के वंशज बिल्कुल लुप्तप्राय है। प्रकृति के सफाई कर्मी के नाम से सुप्रसिद्ध इस पक्षी को देखना दुर्लभ है।
पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ प्रमोद शर्मा ने बताया कि, इनकी कमी के कारणों में पर्यावरणीय परिवर्तन के अलावा पशुओं के लिए प्रयुक्त होने वाली तरह-तरह की दवाइयों का प्रयोग भी शामिल है। इसके अतिरिक्त जंगलों की अंधाधुंध कटान व दिनों-दिन हो रही आबादी में वृद्धि के कारण घटते मैदान एवं तालाब तथा पॉलीथिन परंपरा के चलते भी गिद्धों की संख्या में कमी माना जा रहा है।
इन तथाकथित गिद्धों का भोजन मरे पशुओं का शरीर होने के कारण यह कुदरती तौर पर मृत पशुओं को खाकर सफाई रखते हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में यह हमारी सदैव मदद करते आए हैं। कुछ वर्षो में इनकी संख्या में लगातार कमी होने के कारण ग्रामीण इलाकों में मृत पशु सड़ कर दुर्गध फैलाते रहते हैं। जिससे पर्यावरण के अंसतुलन की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। साथ ही उन स्थानों पर बीमारी फैलने की आशंका हो जाती है।
यह मरे पशुओं को खाकर जहां गंदगी फैलने से रोकता है, वहीं वह पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त करने में अपनी अहम भूमिका भी निभाता है। यह पक्षी प्राय:बडे़ वृक्षों पर ही अपना घोंसला बनाता है, जहां इनका निवास होता है, परंतु बडे़ पेड़ों के कट जाने व आंधी तूफान में उखड़ जाने से भी यह प्रभावित होने से नहीं बच सके। भारी शरीर के यह पक्षी बडे़ डरावने लगते हैं।
बिजली के तारों से टकराकर भी इनकी अकारण ही मौत हो जाती है। कभी-कभार दो चार की संख्या में भले ही दिखाई दे जाए, अन्यथा इनके दर्शन होना कठिन है।
बछरावां/रायबरेली: दशकों पहले जटायु राज गिद्ध के झुंडों से गुलजार रहने वाले आसमान आज इनकी उड़ानों से वीरान हो चुके हैं। गिद्धों की घटती संख्या और बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण का खतरा बढ़ता जा रहा है।
आपको बता दें कि, विकास क्षेत्र के बसंतपुर गांव के पास एक वृद्ध गिद्ध को ग्रामीणों ने देखा। कड़ी मशक्कत के बाद ग्रामीणों ने उसे पकड़कर वन कर्मियों के सुपुर्द किया है। ग्रामीणों की माने तो करीब तीन दशक पहले गिद्धों के झुंड दिखाई देते थे, पर अब पर्यावरण संतुलन में सहायक गिद्धराज जटायु के वंशज बिल्कुल लुप्तप्राय है। प्रकृति के सफाई कर्मी के नाम से सुप्रसिद्ध इस पक्षी को देखना दुर्लभ है।
पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ प्रमोद शर्मा ने बताया कि, इनकी कमी के कारणों में पर्यावरणीय परिवर्तन के अलावा पशुओं के लिए प्रयुक्त होने वाली तरह-तरह की दवाइयों का प्रयोग भी शामिल है। इसके अतिरिक्त जंगलों की अंधाधुंध कटान व दिनों-दिन हो रही आबादी में वृद्धि के कारण घटते मैदान एवं तालाब तथा पॉलीथिन परंपरा के चलते भी गिद्धों की संख्या में कमी माना जा रहा है।
इन तथाकथित गिद्धों का भोजन मरे पशुओं का शरीर होने के कारण यह कुदरती तौर पर मृत पशुओं को खाकर सफाई रखते हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में यह हमारी सदैव मदद करते आए हैं। कुछ वर्षो में इनकी संख्या में लगातार कमी होने के कारण ग्रामीण इलाकों में मृत पशु सड़ कर दुर्गध फैलाते रहते हैं। जिससे पर्यावरण के अंसतुलन की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। साथ ही उन स्थानों पर बीमारी फैलने की आशंका हो जाती है।
यह मरे पशुओं को खाकर जहां गंदगी फैलने से रोकता है, वहीं वह पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त करने में अपनी अहम भूमिका भी निभाता है। यह पक्षी प्राय:बडे़ वृक्षों पर ही अपना घोंसला बनाता है, जहां इनका निवास होता है, परंतु बडे़ पेड़ों के कट जाने व आंधी तूफान में उखड़ जाने से भी यह प्रभावित होने से नहीं बच सके। भारी शरीर के यह पक्षी बडे़ डरावने लगते हैं।
बिजली के तारों से टकराकर भी इनकी अकारण ही मौत हो जाती है। कभी-कभार दो चार की संख्या में भले ही दिखाई दे जाए, अन्यथा इनके दर्शन होना कठिन है।






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