🙅विधवा माँ की एक बेटी ने,
कहकर यह बलिदान किया,
इस दहेज की बेदी पर माँ,
करती हूँ यह काम नया ।
√ थी बहुएँ अब तक जली मरी,
अब तो कन्या भी जाती है,
इस दहेज की ज्वाला में,
एक नई कड़ी जुड़ जाती है ।
√ इस मानव तन के व्यापारी,
पहले जिनकी थी जगह नहीं,
कोई न मिला तो कर बैठे,
अपने बेटे का मोल वही ।
√ सुनता था मेरे पूर्व पूज्य,
पितरों ने ऐसा किया कृत्य,
बेटा माँगा तो बात रखी,
पर वरण किया था स्वयं मृत्यु ।
√ इस आज राक्षसी युग में तो,
पैसा ही है वह मुख्य तत्व,
बिक जाए धरम या शान कहीं,
पर मुझको मिल जाये समत्व ।
√ यह सोच के माँ अब चली अभी
मुझको कर देना मॉफ सभी,
मृत्योपरांत मेरे उमंग,
होगा दहेज दानव अपंग ।
√ मैं जाती माँ अब सोच नकर,
रोने से मन हो रहा क्लान्त,
ऊंची आशाएं लिए - लिए,
तू मुझे सुला दे नींद शांत ।
√ माँ की ममता तब पड़ी उमड़,
था पुल जो वह भी गया बिखर,
बह पड़ी धार सीसे समान,
भीगा उससे कण - कण तृण - तृण ।
√ मैं तनहा इस युग की नारी,
पाला तुझको खुदखा गाली,
खुद सहे दुःख नाना प्रकार,
पर तुझे दुलारा बार - बार ।
√ बेटी मैंने तुझको पाला,
दुःखो का ढेर मिला काला,
जिसकी ड्योढ़ी पर पहुँची मैं,
तो मुझको पड़ा मिला ताला ।
√ बेटी अब मैं भी ऊब चुकी,
इस दानव युग को देख चुकी,
तू नहीं मानती तो यह ले,
तुझसे पहले मैं चली अभी ।
√ एक हुआ प्रलय,
एक कहर ढ़ली,
एक बिजली सी आ,
ज़मी गिरी ।
√ पाताल व्योम तक उठा काँप,
सतियों का ऐसा सुन मिलाप,
हा ! कर न सका मानव विलाप ।
√ सदियों से मिटा नहीं पर अब,
शायद मिट जाए महापाप ।
√ Written by~कमल बाजपेई
कहकर यह बलिदान किया,
इस दहेज की बेदी पर माँ,
करती हूँ यह काम नया ।
√ थी बहुएँ अब तक जली मरी,
अब तो कन्या भी जाती है,
इस दहेज की ज्वाला में,
एक नई कड़ी जुड़ जाती है ।
√ इस मानव तन के व्यापारी,
पहले जिनकी थी जगह नहीं,
कोई न मिला तो कर बैठे,
अपने बेटे का मोल वही ।
√ सुनता था मेरे पूर्व पूज्य,
पितरों ने ऐसा किया कृत्य,
बेटा माँगा तो बात रखी,
पर वरण किया था स्वयं मृत्यु ।
√ इस आज राक्षसी युग में तो,
पैसा ही है वह मुख्य तत्व,
बिक जाए धरम या शान कहीं,
पर मुझको मिल जाये समत्व ।
√ यह सोच के माँ अब चली अभी
मुझको कर देना मॉफ सभी,
मृत्योपरांत मेरे उमंग,
होगा दहेज दानव अपंग ।
√ मैं जाती माँ अब सोच नकर,
रोने से मन हो रहा क्लान्त,
ऊंची आशाएं लिए - लिए,
तू मुझे सुला दे नींद शांत ।
√ माँ की ममता तब पड़ी उमड़,
था पुल जो वह भी गया बिखर,
बह पड़ी धार सीसे समान,
भीगा उससे कण - कण तृण - तृण ।
√ मैं तनहा इस युग की नारी,
पाला तुझको खुदखा गाली,
खुद सहे दुःख नाना प्रकार,
पर तुझे दुलारा बार - बार ।
√ बेटी मैंने तुझको पाला,
दुःखो का ढेर मिला काला,
जिसकी ड्योढ़ी पर पहुँची मैं,
तो मुझको पड़ा मिला ताला ।
√ बेटी अब मैं भी ऊब चुकी,
इस दानव युग को देख चुकी,
तू नहीं मानती तो यह ले,
तुझसे पहले मैं चली अभी ।
√ एक हुआ प्रलय,
एक कहर ढ़ली,
एक बिजली सी आ,
ज़मी गिरी ।
√ पाताल व्योम तक उठा काँप,
सतियों का ऐसा सुन मिलाप,
हा ! कर न सका मानव विलाप ।
√ सदियों से मिटा नहीं पर अब,
शायद मिट जाए महापाप ।
√ Written by~कमल बाजपेई

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