🍷हट गई बंदिशें सारी,
🍷मतलब परस्ती हो गई।
🍪आज फिर रोटी महंगी,
🍾शराब सस्ती हो गई।।
◆गरीबी गर्दिश में दम तोड़ती है,
◆इक कहानी है।
◆अमीरी बोतल पे नाचती है,
◆बदजुबानी है।।
◆नशे में हो गए सारे,
◆मयखाने में मस्ती हो गई।
◆आज फिर रोटी मंहगी,
◆शराब सस्ती हो गई।।
◆घरों में महफूज थे,
◆सलामत जान थी हमारी।
◆उठा जो भीड़ का मंजर,
◆न जाने क्या सिला होगा।।
◆फिक्रमंद थी जो कभी वो फिर,
◆खतरों की बस्ती हो गई।
◆आज फिर रोटी महंगी,
◆शराब सस्ती हो गई।।
◆हट गई बंदिशें सारी,
◆मतलब परस्ती हो गई।
◆आज फिर रोटी महंगी,
◆शराब सस्ती हो गई।।
प्रवीण प्रताप सिंह (राजीव)
खीरों - रायबरेली।
मो.नं - 9936306069
🍷मतलब परस्ती हो गई।
🍪आज फिर रोटी महंगी,
🍾शराब सस्ती हो गई।।
◆गरीबी गर्दिश में दम तोड़ती है,
◆इक कहानी है।
◆अमीरी बोतल पे नाचती है,
◆बदजुबानी है।।
◆नशे में हो गए सारे,
◆मयखाने में मस्ती हो गई।
◆आज फिर रोटी मंहगी,
◆शराब सस्ती हो गई।।
◆घरों में महफूज थे,
◆सलामत जान थी हमारी।
◆उठा जो भीड़ का मंजर,
◆न जाने क्या सिला होगा।।
◆फिक्रमंद थी जो कभी वो फिर,
◆खतरों की बस्ती हो गई।
◆आज फिर रोटी महंगी,
◆शराब सस्ती हो गई।।
◆हट गई बंदिशें सारी,
◆मतलब परस्ती हो गई।
◆आज फिर रोटी महंगी,
◆शराब सस्ती हो गई।।
प्रवीण प्रताप सिंह (राजीव)
खीरों - रायबरेली।
मो.नं - 9936306069


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