"बेबस परिन्दा" कमल बाजपेई

◆है मजबूरी परिन्दों की, बहुत चुप चाप हैं रोते,
इन्हें भी कष्ट होता है कि उनके घर नहीं होते ।
◆है गाना गा रही चिड़ियाँ सभी का है यही लेखा,
बढ़ी हलचल थी झुरमुट में खिंची भय की बड़ी रेखा ।
◆बहुत कोमल है ये पक्षी बताऊं अब तुम्हें सच्ची,
है भूखे पेट ये सोते, मगर होते न नर भक्षी ।
◆जगत की रीत देखो तो, हमें है चाह खग होते,
खुले आकाश में उड़ते, अगर मेरे भी पर होते ।
◆Written by ~कमल बाजपेई

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