"तटबंध-सरिता नीर" कमल बाजपेई

◆मैं अविरल सा बहा करूँगा,
तुम तटबंध वहीं पर रहना  ।
मैं सबको आतृप्त करूँगा,
तुम अपने मे सीमित रहना  ।।
◆जल ना कहीं ठहरना जाने,
तज माया का यह गठबंधन  ।
बहते रहना प्रकृति हमारी,
तुम लिप्सा बस स्थिर रहना।।
◆जाने कहाँ - कहाँ पर जाऊ,
ऊपर से नीचे को बहते  ।
तुम नीचे से ऊपर चढ़ना,
मोह जाल में लिपटे-चिपटे  ।।
◆रंग रूप नही मेरा है,
जो जैसा है घुलमिल जाऊ ।
तुम अपना अस्तित्व बनाना,
सारे जग को पड़े दिखाई।।
◆मुझमे गर्व नही है तिलभर,
सीधा मुड़ता बहता जाऊ ।
तुमने दम्भ पाल रखा है,
आडम्बर को छोड़ ना पाऊ ।।
◆मैं नदिया का नीर एक हूँ,
तुम तटबंध अलग और न्यारे ।
मैं ठंढक शीतलता देता,
तुममे चकाचौंध है प्यारे ।।
◆दो तटबंध अगर मिल जाये,
सोचो तब क्या होगा भाई ।
जल बिन धरा, धरा बिन जल के,
विप्लव की दिखती परछाईं ।।
◆प्रकृति तुम्हे है नमन हमारा,
जो है दृश्य बहुत सुखदायी ।
कृपा मनुज पर करते रहना,
हम सब तेरे है अनुयायी ।।
◆Written by -कमल बाजपेई

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