◆प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे,
परबस पड़ा अनाथ दीन तू,
भौतिकता में लीन - हीन तू,
आँखे अपनी मीचे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆उठो जाग अबनहि अनाथ,
एक युग को अपने लिए साथ,
तू चाहे तो अब क्या मुश्किल,
हो जायें नदियां वक्र कुटिल,
फिर भी तू नहिं सीखे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆मिट जाए द्वेष दुराव अनल,
आ जाये राम राज्य सा फिर,
तेरे जीवन का पा सम्बल,
बन गौतम बुद्ध सरीखे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆याद करो पुरुषार्थ आपना,
संघर्षों से करो सामना,
रुक ना सकेंगे तेरे सामने,
ये टीले और ईंटे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆करो नाम तुम अमर देश हित,
तन - मन करो निछावर जनहित,
सब संसार तेरा ही घर है,
क्यूँ रेखाएं खींचे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆समय बिताकर जगा काश तो,
निकल गया युग अगर हाथ तो,
सूख गई यदि मूल वृक्ष की,
व्यर्थ तू पत्ते सींचे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆Written by - कमल बाजपेई
परबस पड़ा अनाथ दीन तू,
भौतिकता में लीन - हीन तू,
आँखे अपनी मीचे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆उठो जाग अबनहि अनाथ,
एक युग को अपने लिए साथ,
तू चाहे तो अब क्या मुश्किल,
हो जायें नदियां वक्र कुटिल,
फिर भी तू नहिं सीखे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆मिट जाए द्वेष दुराव अनल,
आ जाये राम राज्य सा फिर,
तेरे जीवन का पा सम्बल,
बन गौतम बुद्ध सरीखे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆याद करो पुरुषार्थ आपना,
संघर्षों से करो सामना,
रुक ना सकेंगे तेरे सामने,
ये टीले और ईंटे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆करो नाम तुम अमर देश हित,
तन - मन करो निछावर जनहित,
सब संसार तेरा ही घर है,
क्यूँ रेखाएं खींचे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆समय बिताकर जगा काश तो,
निकल गया युग अगर हाथ तो,
सूख गई यदि मूल वृक्ष की,
व्यर्थ तू पत्ते सींचे,
प्राणी दिवास्वप्न क्यूँ दीखे ।
◆Written by - कमल बाजपेई

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