काशी प्रांत (जिसमें मिर्जापुर भी है) में प्रात: 8:27 बजे के बाद से शुरू होगा मुहूर्त जबकि अन्यत्र 9:30 पूर्वाह्न से--
रक्षा बंधन में प्राकृतिक उपादानों की हो सुरक्षा--
मिठाई की जगह काढ़ा, तुलसी का पौधा दिया जाए---
धार्मिक पर्वों का नया पुराण लिखा जाए---
मिर्जापुर। कोरोना सारे पर्वों के भव्य स्वरूप पर डाका डाले हुए हैं। पारिवारिक स्नेह-प्रेम का रक्षाबंधन पर्व भी प्रभावित हुआ है। फिलहाल *कोरोना काल* में पौराणिक काल से चले आ रहे पर्व को नए परिवेश में मनाने की जरूरत है।
जो भी करे रक्षा वही सब कुछ- प्रायः परिवारों में भाई का विवाह हुआ नहीं कि बहन की उपेक्षा शुरू हो जाती है। धारणा है कि पीहर में पिता के निधन के बाद लड़कियां पूर्णतया पराई हो जाती हैं । मां का पुत्र पर वश नहीं रहता लिहाजा जिस दिन बेटी को पता चलता है कि पिता अब नहीं रहे तो वह चीत्कार कर रो पड़ती है। जबकि मां के निधन पर चीत्कार वैसा नहीं करती।
प्रकृति को भाई बनाएं- मनुष्य ने प्रकृति से रिश्ता 36 का बनाया तो प्रकृति भी कुपित हुई और धरती पर यमराज तथा उसकी टीम कोरोना के रूप में आतंक फैलाते दिख रही है। इसलिए अब प्रकृति से भाई, माता-पिता, सखा-सखी का संबन्ध बनाना आवश्यक हो गया है ।
नई शुरुआत हो- इस संबन्ध में सामाजिक कार्यों में आगे रहने वाले महिला प्रबोधिनी संस्था के श्री विभूति मिश्र से यह कहा गया कि वे इस बार अपनी संस्था की महिलाओं द्वारा वट-वृक्ष को राखी बंधवाएं । उन्होंने सावन के प्रदोष तिथि को अपनी पत्नी श्रीमती नन्दिता मिश्र को इस शुभ कार्यमें लगाया। श्रीमती मिश्र ने पीपल वृक्ष की विधिवत पूजा की और उसे राखी बांधा।
नया पुराण लिखने की जरूरत- सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में धार्मिक उत्सवों के नए स्वरूप पर विचार होना चाहिए। कर्मकांड के जानकार आचार्य पं जगदीश द्विवेदी जो विगत वर्षों तक पूरे सावन में लगभग 60 रुद्राभिषेक कराते थे। एक एक अभिषेक में 5 से 11 पुरोहित रुद्राष्टाध्यायी का सस्वर पाठ करते थे, इस बार 2-3 ही पुरोहितों से 15-20 अभिषेक हो सके। पहले श्रीसत्यनारायण व्रत कथा, अखण्ड मानसपाठ में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी होती थी, वहीं अब वह सीमित होता जा रहा है ।
जड़ है लेकिन चैतन्यता बढाते हैं प्राकृतिक उपादान- पेड़-पौधे, नदी-झरने, अग्नि-वायु, सूरज-चांद-सितारे ये प्राकृतिक उपादान मनुष्य को शक्तिमान बनाते हैं । सगा भाई कष्ट दे सकता है लेकिन प्रकृति की रक्षा की जाएगी तो उससे कष्ट नहीं मिलेगा । इसलिए इस वर्ष पेड़ों-पौधों, नदी-तालाब, कुओं-झरनों को राखी बांधी जानी चाहिए । यानी इनको स्वच्छ रखने के उपाय किए जाने चाहिए । ध्वनिप्रदूषण, अग्निप्रदूषण, जलप्रदूषण आदि रोकने का कुछ न कुछ कार्य हर घर के हर लोग जरूर करें।
सिर्फ संकल्प न लें- हाथ आगे कर बहुत संकल्प लिए गए, लेकिन मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की जैसी कहावत दिखी। इस वर्ष राखी-पर्व पर मिठाई की जगह काढ़ा, तुलसी के पौधे का आदान-प्रदान होना चाहिए।
©सलिल पांडेय, मिर्जापुर।






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