जागरण-पर्व पर आते थे बड़े बड़े राजे-रजवाड़े और कवि-शायर
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नगरवधुओं के पायल की झंकार से मदहोश होता था शहर
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कला योगमाया की नगरी से मायानगरी की ओर उन्मुख हो गई
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मिर्जापुर । कला कद्रदानों को सलाम करती है तो कद्रदान कला पर कुर्बान होते हैं । यदि 100 साल पीछे चले तो यहां योगेश्वर श्रीकृष्ण की अग्रजा (बहन) योगमाया के अवतण दिवस भाद्रपद कृष्ण पक्ष, द्वितीया, तदनुसार 5 अगस्त '20 (बुधवार) को विंध्यक्षेत्र में मंत्र गूंजते थे तो नगर के मध्य त्रिमुहानी मुहल्ले में।यहां *नगरवधुओं के नृत्य-गीत-संगीत* का रसास्वादन तथा मान-सम्मान बढ़ाने केवल मिर्जापुर ही नहीं, पड़ोस के काशी स्टेट के नरेश सहित अनेक नरेश, बड़े-बड़े कवि-शायर तथा अपने को लगाने वाले दूर-दूर से आते रहे। इलाके में रससिक्तों की इतनी भीड़ होती थी कि यदि सुई गिर जाए तो उसकी आवाज नहीं होती थी।
जागरण पर्व, जिसे लोकभाषा में जगरन कहते हैं
यह पर्व कंस के हाथों मारने के उद्देश्य से फेंकी गई *योगमाया* के विन्ध्यपर्वत पर आने की कथा से जुड़ा है। योगमाया कंस के हाथों जब छूटकर वह आकाश में गईं तो देवमंडल ने रथ दिया और उनकी स्तुति में मंत्र तथा देवियों ने जो गीत गाए वहीं विंध्यक्षेत्र में आकर देवताओं के यज्ञ-अनुष्ठान तथा मातृशक्तियों के गीत कजलीगीत हो गए।
कजली वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले गीत हैं। वर्षा ऋतु में आकाश काजल की तरह तो नदियों का रूप भी मटमैला हो जाता है। लिहाजा प्रकृति के साथ तालमेल बैठाने का गीत है कजली।
गणिका बनाम नगरवधु बनाम वेश्या (तवायफ)
मान्यता है कि योगमाया के साथ इंद्रलोक से आईं नृत्यांगनाओं का प्रतीक मानकर नगर में जागरण पर्व पर नृत्य और संगीत के आयोजन प्राचीन काल से शुरू हुए जो बाद में नगरवधुओं के हवाले हो गए। यहां तक भी इस विधा का सम्मान था। क्योंकि इसमें कला के कद्रदान आते थे।
काशीनरेश, भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र, प्रेमघन जी भी इसे देते थे सम्मान
जागरण पर्व पर पूरा इलाका जागता था। कंस जैसे अत्याचारियों से लड़ने के लिए जागना जरूरी है । जब तक काशनरेश और हिंदी साहित्य के नवजागरण काल के मशालधारी भारतेन्दु बाबू यहाँ आते थे तो यहां संगीत कला जीवित थी। उसके बाद रुप बिगड़ता चला ही गया।
मिर्जापुर और जबलपुर की नगरवधुओं का पूरे देश में था सम्मान
उस दौर तक सम्मान था नगरवधुओं के नृत्य का । दूर-दूर से नगरवधुएं जागरण के पहले यहां बुलाई जाती थी। केवल कला की बात होती तो ठीक लेकिन कालांतर में फिल्मों में तवायफ-रिवाज़ ने कला पक्ष को कमजोर किया और नारी-सौंदर्य पक्ष को बढ़ावा दिया । फिर यहां का जागरण पर्व फिसलते फिसलते बदनामी के कोठे तक चला गया।
फिर तो 'मैं तवायफ हूं मुजरा करूंगी' तक आ गया
फिल्मी प्रभाव था । फिल्मजगत में नृत्यांगनाओं की डिमांड से कला-साधिकाएं योगमाया की नगरी छोड़ मायानगरी मुंबई की ओर रुख कर बैठी और यहां यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते गीत के माध्यम से बेसुरे कद्रदानों के हाथ पर्व आ गया तो वह अंततः विकृत ही होता गया। अब तो नाममात्र की कला शेष है।
©सलिल पांडेय, मिर्जापुर।
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