महाराष्ट्र की उद्धव सरकार और बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के बीच तकरार अब शवाब पर है। दोनों तरफ शब्दभेदी बाण चलाएं जा रहे है। खासकर बीएमसी की क्रूरता या यूं कहे बर्बरतापूर्ण कार्रवाई देश का आमजनमानस भी उबल रहा है। कोने-कोने में अघाड़ी की शिवसेना सरकार के खिलाफ उद्धव के पुतले जलाएं जा रहे है। हर शख्स की जुबान पर एक ही सवाल है फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत का ऑफिस तोड़ा, तो देश का दुश्मन नंबर वन अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का घर क्यों छोड़ा? आखिर क्या वजह है कि कंगना पर एक्शन, दाऊद की संपत्ति को प्रोटेक्शन दिया जा रहा है? ब्रतानियां हुकूमत की तर्ज पर हंटर चला रही महाराष्ट्र की उद्धव सरकार से लोग जानना चाह रहे है कि दाऊद की इमारत पर बीएमसी का बुलडोजर कब चलेगा?
आपको बता दें कि, बीएमसी ने कंगना रनौत के पाली हिल्स इलाक़े में स्थित दफ्तर को 24 घंटे के नोटिस के बाद तोड़ दिया। उसके बाद से देशभर में लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। हर तरफ से एक ही आवाज उठ रही है कंगना का घर तोड़ने वालों ने दाऊद का घर क्यों छोड़ दिया। जबकि निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक का आदेश है कि अवैध रुप से बनी दाऊद की जर्जर हो चुकी बिल्डिंग को तत्काल तोड़ा जाएं। कंगना भी इस मामले को लेकर लंबी लड़ाई के मूड में नजर आ रही हैं। उन्होंने शुक्रवार को ट्वीट कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर भी निशाना साथा। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि इस मामले में उनकी चुप्पी इतिहास में याद की जाएगी। उन्होंने सोनिया गांधी से पूछा कि वह भी एक महिला हैं, ऐसे में महाराष्ट्र में उनकी सरकार डॉ. आंबेडकर के संविधान का उल्लंघन कर रही है तो वह चुप क्यों हैं?
उनके इस सवाल के बाद तो अब महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इस मामले को लेकर उद्धव ठाकरे सरकार पर निशाना साधा है। फडणवीस ने कहा है कि दाऊद इब्राहिम का घर नहीं तोड़ा जाता, जबकि कंगना का घर तोड़ दिया जा रहा है। मतलब साफ है कंगना रनौत के ऑफिस पर बीएमसी का बुलडोजर चलने का मामला सियासी रूप ले चुका है। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने भी कंगना से मिलने के बाद महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात की। आठवले ने कंगना रनौत के दफ्तर पर बीएमसी की कार्रवाई को गलत ठहराते हुए राज्यपाल से मुआवजे की मांग की है। कंगना रनौत के साथ किए जा रहे व्यहार पर अयोध्या के साधु संतों और विश्व हिंदू परिषद भी खफा है। हनुमान गढ़ी मंदिर के पुजारी महंत राजू दास ने कहा कि उद्धव ठाकरे और शिवसेना का अब अयोध्या में कोई स्वागत नहीं है। यदि वे यहां आते हैं तो अयोध्या के संतों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने अभिनेत्री के खिलाफ बिना समय बर्बाद किए काम को अंजाम दिया। लेकिन वही सरकार अभी तक पालघर में दो साधुओं के हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकी है।
शिवसेना कंगना रनौत पर हमला क्यों कर रही है? हर कोई समझ सकता है। हर कोई जानता है उद्धव किसे बचा रहे है। यह कोई रहस्य नहीं है। शिवसेना वह नहीं रही, जो कभी बालासाहेब ठाकरे के अधीन हुआ करती थी। महाराष्ट्र सरकार अब असामाजिक गतिविधियों में शामिल लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है। जबकि यह एकदम स्पष्ट है कि कंगना राष्ट्रवादी ताकतों का समर्थन कर रही है और उसने मुंबई के ड्रग माफिया के खिलाफ आवाज उठाई है। यही वजह है कि महाराष्ट्र सरकार जानबूझकर कंगना रनौत के खिलाफ बदले के इरादे से कार्रवाई कर रही है। कंगना के वकील का दावा है कि बीएमसी की कार्रवाई में करीब दो करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। बीएमसी की कार्रवाई का मामला हाई कोर्ट में है। बता दें, मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र के बारे में कंगना के एक हालिया बयान से विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने दावा किया था कि वह मुम्बई में असुक्षित महसूस करती हैं। इसके बाद शिवसेना के नेता संजय राउत ने उनसे मुम्बई वापस नहीं आने को कहा था। राउत के इस बयान के बाद अभिनेत्री ने मुम्बई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से की थी।
फिरहाल, कंगना जिस तरीके से वॉलीवूड में छाई फूहड़पन और शिवसेना की तानाशाही या यूं कहे ’सरकारी गुंडागर्दी’ के खिलाफ मुखर है, उसे लोग उन्हें वीरांगना कंगना कहने लगे है। यह अलग बात है इसके बदले उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ रही है। अवैध तरीके से उनके घर जमीनदोंज किए जा रहे है। जगह-जगह फर्जी रपट लिखी जा रही है। जबकि इस तरह ब्रतानियां कार्रवाई से अच्छे-अच्छे टूट जाते है, लेकिन वो झांसी की रानी की तरह सीना तान कर खड़ी है और आर-पार के जंग की चुनौती दे रही है। ऐसे में उन्हें झासी की रानी नहीं तो और क्या कहेंगे? लेकिन बड़ा सवाल तो यह है कि कल तक जो लोग जरा-जरा सी बात अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर पूरा कायनात सिर पर उठाते लेते थे, उन्हें इंडिया में डर सताने लगा था, खासकर एवार्ड वापसी व मोमबत्ती गैंग इस ज्यादिती पर चुप्पी क्यों नहीं टूट रही है? मतलब साफ है सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जो राजनीति शुरू हुई थी, वो आज एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई, जहां से इसका असर महाराष्ट्र की राजनीति पर पड़ना तय है। पूरी फिल्म इंडस्ट्री में अकेली कंगना रनौत ही ऐसी बड़ी कलाकार हैं जो खुलकर बोल रही हैं। उन्होंने ही इस मामले को पहले नेपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद से जोड़ा था। लेकिन बात बढ़ते-बढ़ते यहां तक आ पहुंची। अब ये मामला फिल्म इंडस्ट्री से निकलकर महाराष्ट्र की राजनीति पर छा चुका है।
ये वही मुंबई है जहां जरा सी बारिश होते ही सड़कों पर पानी भर जाता है और लोगों को घंटों-घंटों रास्ते में फंसे रहना पड़ता है। मुंबई एक ऐसा शहर है जहां फुटपाथ से लेकर पार्क तक की सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे हैं। जिन्हें खाली कराने की कोशिश नहीं की जाती है। अकेले मुंबई एयरपोर्ट की लगभग कई एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा है और वहां पर झुग्गियां बनी हुई हैं। ये हालत तब है जब बीएमसी इस देश की सबसे पैसे वाली नगर महापालिका है। इसका बजट लगभग 34 हजार करोड़ रुपये का है। ये देश के कई छोटे राज्यों से अधिक है। लेकिन जब कंगना रनौत का मामला आया पूरी महाराष्ट्र सरकार और बीएमसी सक्रिय हो गई। कंगना के दफ्तर में अवैध निर्माण का नोटिस देने के 24 घंटे होते ही बीएमसी का पूरा दस्ता बुलडोजर लेकर पहुंच गया। इस कार्रवाई पर महाराष्ट्र सरकार के बड़े नेताओं की नजर थी। ऐसे में बड़ा सवाल है कि महाराष्ट्र सरकार की लड़ाई किससे है? कोरोना से या कंगना से? कंगना रनौत से महाराष्ट्र सरकार की लड़ाई राजनीतिक थी, जिसे राजनीतिक तरीके से लड़ा जा सकता था। लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने शुरू से ही इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। शुरुआत शिवसेना के नेताओं ने की। पहले उन्हें मुंबई न आने की धमकी दी गई, बाद में उनके दफ्तर पर बुलडोजर भेजकर हिसाब चुकता किया गया।
दरअसल, ये शिवसेना के पॉलिटिकल स्टाइल का हिस्सा बन चुका है। शिवसेना अपने विरोधियों या अपने खिलाफ बोलने वालों पर ऐसी कार्रवाई के लिए अक्सर विवादों में रहती है। लेकिन इस बार ये मामला राजनीति से ज्यादा प्राथमिकता का है। यह ऐसा समय है जब 24 घंटे जागने वाली मुंबई ठप पड़ी है। मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनें बंद हैं. इनके दिवाली से पहले शुरू होने के आसार नहीं हैं। लोकल ट्रेनें बंद होने से लाखों लोगों को दिक्कत हो रही है। इसका लोगों के कारोबार और कमाई पर बहुत बुरा असर पड़ा है। मुंबई के अस्पताल कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों से भरे पड़े हैं। हर रोज लगभग 50 से 60 लोगों की जान इस महामारी के कारण जा रही है। ऐसी मानवीय त्रासदी के समय में महाराष्ट्र सरकार अगर कंगना रनौत के दफ्तर में किसी अवैध निर्माण को तोड़ने पर ताकत लगाती है तो इससे पता चलता है कि उसकी प्राथमिकता क्या है? लगता है महाराष्ट्र सरकार का ध्यान कोरोना संकट से ज्यादा बॉलीवुड की एक खास लॉबी के संकट पर है। बॉलीवुड की ये वो लॉबी है जिसकी रंगारंग पार्टियों महाराष्ट्र सरकार के कई मंत्री और नेता भी जाते हैं। लेकिन महाराष्ट्र की सरकार चला रहे नेताओं को यह समझना होगा कि यह राजनीति बहुत लंबे समय तक नहीं चलती है। भारत की जनता ऐसी राजनीति को कतई पसंद नहीं करती।


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