"¶अपनों को भेजी पाती¶"
¶¶कहाँ तक दुबक कर अकेले रहेंगे,
¶ये नीरस कठिन दिन कभी तो ढ़लेंगे,
¶दुखों संग सुखों का चलन ज़िन्दगी में,
¶नई कोपलें ज्यों हँसे फिर चमन में,
¶ऐ पतझड़ दुखों का समय काल थोड़ा,
¶नए फूल खुशियाँ मिलेंगी सफर में,
¶कहाँ तक दुबक कर अकेले रहेंगे,
¶ये नीरस कठिन दिन कभी तो ढ़लेंगे ।
¶¶हो मंजर भयानक हवा में जहर हो,
¶ज़रा मृत्यु भी अब कहर ढ़ा रही हो,
¶जो अपने हैं बिछुड़े भयावह सफर में,
¶रखो धैर्य मन में भरोसा प्रभू में,
¶कहाँ तक दुबक कर अकेले रहेंगे,
¶ये नीरस कठिन दिन कभी तो ढ़लेंगे ।
¶¶शुरू यदि हुआ है खतम खेल होगा,
¶दुखों से शुरु है खतम सुख से होगा,
¶सुखों में हैं मिलते दुखों को भी बाँटे,
¶समय है कठिन पर सभी मिल के काटें,
¶लहर यदि उठी है किनारे मिलेंगे,
¶कहाँ तक दुबक कर अकेले रहेंगे,
¶ये नीरस कठिन दिन कभी तो ढ़लेंगे ।
रचयिता~कमल बाजपेयी

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