किस्सा पाकिस्तान वाला ?

 K Vikram Rao
संसद में नागरिकता विधेयक-2019 पर हुई बहस के दौरान, पुरानी विभीषिका फिर सर्जायी गई। मुद्दा था कि, पाकिस्तान राष्ट्र-राज्य के भ्रूण का जनक कौन था ? अथवा क्या यह इस्लामी मुल्क जारज था ? कुछ सोनिया-कांग्रेसी तो हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पुंसत्व की ओर इशारा करते रहे। वे अनभिज्ञ हैं कि, वीडी सावरकर तथा एमएस गोलवलकर में तीव्र वैचारिक विषमता थी। उसी दौर में सत्तांतरण की ललक में जवाहरलाल नेहरू दृष्टिहीन हो गये थे। उनके यार माउन्टबेटन की बेगम पामेला पर वे लट्टू थे। उधर मोहम्मद अली जिन्ना की आकांक्षा, जैसे कि, उनके अनुज अहमद अली जिन्ना ने बताया, पाकिस्तान का सुल्तान बनने के लिए असीम हो गयी थी।
       तभी अवध से जाकर कराची बसे इस्लामीजन जो नवीन राष्ट्र को अपनी जागीर मान रहे थे, ने जिन्ना से शिकायत की कि “ये सिन्धी-पंजाबी लोग हम  मोहाजिरों का अपमान करते हैं। जबकि पाकिस्तान की माँग को लेकर गंगाजमुना की दोआबा में हम जंग लड़े थे।” इन मुसलमानों को जो अपने पुरखों की मजार को लतिया कर, नई तालुकेदारी की लालच में कराची गये थे, को जिन्ना ने झिड़का: “पाकिस्तान को तुमने बनाया ? 
      ऐसा मुगालता मत पालना। इस कौम को केवल मैंने, मेरे सचिव खुर्शीद हसन और मेरे पुराने टाइपराइटर ने बनाया है।” अखण्ड भारत के लिए केवल एक जुनूनी व्यक्ति जूझता रहा। वे थे बापू (महात्मा गाँधी)| यह अधनंगा फ़कीर डेढ़ गज धोती पहने, लुकाटी लिए, उन्मत्त, जाहिल लोगों को अकेले समझाता फिर रहा था तभी एक नरपिशाच ने उनकी हत्या कर दी थी। इतिहास दिशा भ्रमित हो गया।
    अब कुछ इस नागरिकता विधेयक की बाबत ! विभाजन के समय पाकिस्तान में (पूर्वी भाग मिलाकर) गैरमुसलमान की आबादी इक्कीस प्रतिशत थी। आज केवल सवा फीसद बची है। बाकी को क्या जमीन निगल गई, यमराज डकार गये? अथवा शमशीरे इस्लाम की बलि चढ़ गए? तुलनात्मक रूप से भारत में 1947 में मुसलमान कुल 39 करोड़ में सवा नौ करोड़ थे। आज दुगने से ज्यादा हैं। पच्चीस करोड़ के करीब हैं। प्रजनन तो अधिक है ही। दुनिया के गैरइस्लामी राष्ट्रों में सार्वाधिक भारत में हैं। तो गंगाजमुनी भारतीयों से पूछा जाय कि, क्या बांग्लादेशी, अफगानी और पाकिस्तानी मुसलमानों को नागरिकता विधेयक के तहत भारत में अब और भी जमीन निर्बाध रीति से दी जाये ? एवज में ढाका, लाहौर, सिंध और गंधार से भाग कर भारत आये विस्थापित हिन्दुओं को ये तीनों इस्लामी गणराज्य पर्याप्त आवासीय भूमि लौटायेंगे?
      अमरीका तो स्वयं पड़ोसी मैक्सिको की जमीन हड़प चुका है। भारत को वह उपदेश देगा ? जरा गौर कीजिये। पाकिस्तान के स्कूली छात्रों को पढ़ाया जाता है कि, अट्ठारहवर्षीय अरबी हत्यारा मोहम्मद बिन कासिम अल-तकाफी पहला पाकिस्तानी (आठवीं सदी में) था जिसने सिंध के विप्रनरेश महाराजा दाहिर को हराकर हिन्दू जनता को इराकी उमय्याद खलीफाओं का गुलाम बना दिया था। मोहम्मद कासिम के वंशज का दावा करने वाले जिन्ना वस्तुतः एक गुजराती हिन्दू मछुआरे जीणाभाई के पौत्र थे। हमारे गंगाजमुनी भारतीयों को यह भी पता होगा कि, पाकिस्तानी इतिहासज्ञ लोग जलालुद्दीन अकबर महान को काफ़िर बादशाह मानते हैं। इसीलिए एक भी सड़क, बगीचा, मोहल्ला, कालेज अकबर के नाम पर नहीं है। सारा कुछ केवल आलमगीर औरंगजेब के नाम पर है।
       भारत को अड़सठ वर्ष लगे दिल्ली में औरंगजेब रोड के पट्ट पर राष्ट्रभक्त अब्दुल कलाम मार्ग लिखने में। हालाँकि इस जालिम मुग़ल बादशाह के नाम पर बाजू में गली अभी भी है। अतः सियासतदां को अब याद कराना पड़ेगा कि, भारत पांच हजार साल से ज्यादा पुराना है। चौदह सदियों पुराने मजहब की तुलना में तनिक दोनों के उम्र का लिहाज तो करें। इसीलिए सोनिया-कांग्रेसियों तथा उनके लग्गुओं को सब कुछ हरा हरा ही देखना न उनकी दिमागी परिपक्वता है, और न ईमानदारी। उन्हें देखना होगा कि, जहान में और भी रंग होते हैं। मसलन लाल या गेरुआ।

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