वैशाख माह की पंचमी तिथि अद्वैत मत के प्रवर्तक आदिगुरु शंकराचार्य तथा भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति परंपरा के सन्त कवि सूरदास की जयंती है । आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म 8वीं सदी के उत्तरार्ध सन् 788 ई में केरल प्रान्त के कालपी ग्राम में हुआ था । इनके पिता शिवगुरु तथा माता सुभद्रा भगवान शिव के गहरे उपासक थे । पुत्र प्राप्ति के तीन साल के अंदर ही पिता की मृत्यु हो गई । बालक शंकर की प्रथम गुरु के रूप में उनकी माता ही रही । ईश्वरीय कृपा से बहुत छोटी अवस्था में उन्हें आध्यात्मिक ग्रन्थों का ज्ञान हो गया । उनकी उम्र 8 वर्ष की ही रही होगी । माता के साथ कहीं से आते वक्त नदी पार करने के लिए उसमें घुसे । नदी में रहते हुए माता से जिद करने लगे कि वे संन्यास लेना चाहते हैं । यदि माँ, अनुमति नहीं दोगी तो मैं डूब जाऊंगा । विवश मां ने संन्यास की अनुमति दे दी । अपनी माँ से उन्होंने सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त की थी वह मातृभक्ति और गुरु भक्ति ।
संन्यास के बावजूद मां किया अंत्येष्टि संस्कारयही कारण है कि माता के देहावसान पर संन्यास लेने के बावजूद आदि गुरु शंकराचार्य ने उनकी अंत्येष्टि क्रिया की । एक संन्यासी के इस कार्य की बड़ी आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की । वैदिक ज्ञान से पूर्ण पारंगत होने के बावजूद योग्य गुरु की तलाश उन्हें निरन्तर थी । इसके लिए उन्होंने बहुत प्रयत्न किया । जब उन्हें योग्य गुरु के रूप में गोविंद स्वामी मिल गए तो उनके प्रति खुद को समर्पित कर दिया ।
कर्मवादी
आदि गुरु शंकराचार्य संसार को माया जरूर मानते थे, लेकिन कर्म करने पर बल देते रहे । यही कारण है कि उन्होंने चार मठों की स्थापना की जहां से उन्होंने वेद, वेदांत, उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों तथा अन्यान्य सनातन संस्कृति के उत्थान संबंधित ग्रन्थों की रचना की, टीकाएँ लिखी । उन्हें वैदिक ज्ञान में विकास के गुण-सूत्र नजर आते थे। वर्तमान आधुनिक प्रौद्यागिकी युग में भारतीय ज्ञान का अध्ययन तीब्र गति से हो भी रहा है। आदि गुरु शंकराचार्य शास्त्रार्थ के माध्यम से वायु तरंगों में ज्ञान का प्रवाह निरन्तर करते रहे । इसी क्रम में मंडन मिश्र और उनकी पत्नी को भी आदिगुरु ने पराजित किया । आदि गुरु शंकराचार्य ने भारतीय सँस्कृति पर बौद्ध-अनुयायियों द्वारा लगातार किए जा रहे हमले को अपने ज्ञान के बल पर नेस्तनाबूद किया तथा लुप्त होते वैदिक धर्म का संरक्षण किया ।
भक्त-कवि सूरदास
गुरु शंकराचार्य के 'अहं ब्रह्माSस्मि तत्वमसि' के अद्वैत दर्शन की झलक मध्ययुग में सन्त कवि सूरदास में भी झलकती है । सूरदास के बारे में सर्वाधिक किंवदन्तियाँ उनके दोनों नेत्रों से अंधेपन को लेकर है । अलग अलग विद्वानों की अलग अलग राय है । कोई जन्मजात अंधा मानता है तो कोई किसी नारी पर हुए आकर्षण से उत्पन्न वितृष्णा को लेकर स्वयं आंख फोड़ने से जोड़ा जाता है । क्योंकि उनके बारे में कहा जाता है कि जिस प्रकार से उन्होंने श्रीकृष्ण की बाललीला के अलावा सौंदर्य तथा श्रृंगार का वर्णन किया है वह जन्मांध व्यक्ति नहीं कर सकता । सूरदास संयोग और वियोग दोनों माध्यमों से श्रीकृष्ण को तलाशते दिखते हैं । सूरदास की दृष्टि और चिंतन को भी अद्वैत दर्शन से जोड़ना उपयुक्त होगा । उन्हें जब श्रीकृष्ण रूपी आनन्द का रस अंतर्जगत में मिलने लगा तो वाह्य जगत को देखने वाली आंखें उन्हें निरर्थक लगने लगीं । फिर तो वे 'अविगत गति कछु कहत न आवे, ज्यों गूंगे मीठे फल को रस अंतर्गत ही भावे' बोल पड़ते है । इस दृष्टि से सूरदास गूंगे भी कहे जा सकते है ।
सनातन संस्कृति के उन्यायक
सूरदास का आविर्भाव मध्ययुग है । भारत की सांस्कृतिक परम्परा को छिन्नभिन्न करने का दौर चल रहा है । महाभारत में श्रीकृष्ण का अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करने के प्रयास को सूरदास भी अपनाते हैं। श्रीकृष्ण के यशोदा से सवाल करते 'मैया कबहूं बढ़ेगी छोटी' पद में वे जिस चोटी की बात करते हैं वह शिखा-सूत्र सँस्कृति के बढ़ने के संदर्भ में ही है।
सूरदास का जन्म संवत 1540 के आसपास निर्धारित हुआ है। वे वल्लभाचार्य की शिष्य-परंम्परा के अष्टछाप कवियों और भक्तों में रहे है । श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन कई हजार पदों में सूरदास ने किया । इनके काव्य ग्रन्थों में सूरसागर विशेष रूप से प्रसिद्ध हुआ । इसके अलावा सूरसारावली, साहित्यलहरी, नल दमयंती, व्यहलो भी इनके काव्य ग्रन्थ हैं । इनकी ख्याति से प्रभावित होकर जब अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया तो उनका जवाब था-'मो को कहाँ सीकरी सो काम' । इस इनकार पर खुद अकबर तानसेन के साथ इनका दर्शन करने मथुरा आया। सूरदास के बारे में श्री विट्ठलनाथ के पुत्र गोकुलनाथ ने सारस्वत ब्राह्मण तथा पिता का नाम रामदास बताया है। इसी क्रम में उन्हें कुछ विद्वान चन्द्र बरदाई के वंश का भी मानते हैं । ज्यादार इनका जन्म स्थान नई दिल्ली के पास सीही मानते हैं । सूरदास के 'बांह छुड़ाए जात हौ निबल जानिके मोहिं, हृदय से जब जाओगे सबल जानूंगा तोहिं' दोहा के लिखे जाने का उल्लेख है । लोकश्रुति के अनुसार एक आगरा-मथुरा के बीच गऊघाट में ही वे माता पिता को छोड़कर कृष्ण का दर्शन पाने के लिए रह गए थे। वे कुएं में गिर गए। सात दिन तक वे कुएं में रहे । खुद भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें हाथ पकड़ कर बाहर निकाला । जब श्रीकृष्ण जाने लगे तब उनके मुख से उक्त दोहा निकला । उनकी कविता ब्रजभाषा है। जिस प्रकार सनातन सँस्कृति की रक्षा में आदि गुरु शंकराचार्य ने योगदान दिया, उसी कड़ी को आगे बढ़ाने में सूरदास का भी नाम प्रमुख है । यानि भारत की सांस्कृतिक रक्षा के आरोपित वृक्ष को सींचने का काम सूरदास और आगे चलकर तुलसीदास ने भी किया है ।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
©कापीराइट/ लेखक की बिना अनुमति के नाम एडिट कर अन्य के नाम का प्रयोग दंडनीय


0 टिप्पणियाँ