◆नहीं है वो पहले सा गाँव,
ना वह गालियाँ ना वह पनघट,
ना पीपल की छाँव,
बहना के मुँह नहीं ठिठोली,
नूपुर बजे न पाँव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆नहीं रहे वह प्यारे किंसुक,
ना अबोध शिशु माता,
नहीं मिलन में प्रेम दीखता,
जैसे मिलते भ्राता,
वृद्धों का सम्मान न दिखता,
ना कोई छूता पाँव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆ना वह चौखट जमती द्वारे,
ना आते वे राम पियारे,
वृद्धो की खाँसी न सुनाती,
ना हुक्का ही दिखता द्वारे,
जाड़ों में भी नही दीखता,
जलता कहीं अलाव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆अहिरिन काकी बिटनी अजिया,
ना आती अब चाची अजिया,
बापू, बाबा, बाबू, दादा,
ना अब कोई वेद सुनाता,
आपस में मिलकर करते थे,
वो पहले चोचहाव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆चुक - चुक चलनी,
वहि घर बढ़नी,
ना गुल्ली ना डंडा,
गुलहड़, गोट्टा , कंचा, गोचिया,
वह अंधे का भैंसा,
गुड़िया खेल न दिखता अब तो,
लगे जुए के दाँव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆होली और दिवाली में अब,
ना दिखती है यारी,
यही समय है जब सब निभती,
यहाँ दुश्मनी सारी,
अपनी - अपनी होली होती,
अपना - अपना फाग,
अपनी - अपनी ढपली बजती,
अपना - अपना राग,
शाख - शाख पर कौवे बैठे,
करते काँव - काँव
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆ना रामायण का स्वर आता,
ना मंदिर शहनाई,
ना पंडित जी आते दिखते,
केवल छोड़ सगाई,
सुकुल न बांटन आँवे अब तो,
वो बम्बई कि मिठाई,
कारण का कुछ पता न चलता,
शायद बढ़ा दुराव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
Written by - कमल बाजपेई
ना वह गालियाँ ना वह पनघट,
ना पीपल की छाँव,
बहना के मुँह नहीं ठिठोली,
नूपुर बजे न पाँव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆नहीं रहे वह प्यारे किंसुक,
ना अबोध शिशु माता,
नहीं मिलन में प्रेम दीखता,
जैसे मिलते भ्राता,
वृद्धों का सम्मान न दिखता,
ना कोई छूता पाँव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆ना वह चौखट जमती द्वारे,
ना आते वे राम पियारे,
वृद्धो की खाँसी न सुनाती,
ना हुक्का ही दिखता द्वारे,
जाड़ों में भी नही दीखता,
जलता कहीं अलाव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆अहिरिन काकी बिटनी अजिया,
ना आती अब चाची अजिया,
बापू, बाबा, बाबू, दादा,
ना अब कोई वेद सुनाता,
आपस में मिलकर करते थे,
वो पहले चोचहाव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆चुक - चुक चलनी,
वहि घर बढ़नी,
ना गुल्ली ना डंडा,
गुलहड़, गोट्टा , कंचा, गोचिया,
वह अंधे का भैंसा,
गुड़िया खेल न दिखता अब तो,
लगे जुए के दाँव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆होली और दिवाली में अब,
ना दिखती है यारी,
यही समय है जब सब निभती,
यहाँ दुश्मनी सारी,
अपनी - अपनी होली होती,
अपना - अपना फाग,
अपनी - अपनी ढपली बजती,
अपना - अपना राग,
शाख - शाख पर कौवे बैठे,
करते काँव - काँव
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
◆ना रामायण का स्वर आता,
ना मंदिर शहनाई,
ना पंडित जी आते दिखते,
केवल छोड़ सगाई,
सुकुल न बांटन आँवे अब तो,
वो बम्बई कि मिठाई,
कारण का कुछ पता न चलता,
शायद बढ़ा दुराव,
नहीं है वो पहले सा गाँव ।
Written by - कमल बाजपेई

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