वन में पहुंचने के पूर्व मां कौशल्या खूब याद आईं
---मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को अयोध्या से वन जाते समय प्रयागराज में भरद्वाज ऋषि के आश्रम में पहुंचने के पूर्व माँ कौशल्या की याद आती हैं । जननी के प्रेम को याद करते हैं । मां का हृदय पुत्र के लिए कितना विराट होता है, इसे सोचकर उन्हें सुमित्रा की याद आती हैं तो वे और अधिक बेचैन होते हैं कि जो पीड़ा उनकी मां कौशल्या झेल रही होंगी, वह पीड़ा लक्ष्मण की मां को न हो । इसलिए वे लक्ष्मण से अयोध्या लौट जाने के लिए कहते हैं ।
वाल्मीकि रामायण
- किसी मां के मनोविज्ञान को वाल्मीकिजी ने अयोध्याकांड के 53वें सर्ग में इसका उल्लेख किया है । 21 श्लोकों में पुत्र का मां के प्रति दायित्व संबंधित कारुणिक वर्णन मिलता है । श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं-'मेरी माता ने चिरकाल तक स्वयं दुःख सहकर मेरा पालन पोषण किया । अब जब पुत्र से सुख रूपी फल पाने का अवसर आया तब मैंने मां को अपने से विलग कर दिया । मुझे धिक्कार है ।
सन्देश- श्रीराम का यह कथन आधुनिक सन्दर्भों में इसलिए उचित है कि प्रायः पुत्र के दायित्व निर्वाह की घड़ी जब आती है तब पुत्र यदि मां की उपेक्षा करता है, वह अत्यंत निंदनीय है ।
नारियों के लिए सन्देश- श्रीराम के अनुसार-'लगता है कि मेरी माँ ने पूर्व जन्म में कुछ माताओं को उनके पुत्रों से विलग किया था, इसलिए उन्हें यह कष्ट देखना पड़ रहा है ।' इस कथन के माध्यम से श्रीराम 'जैसी करनी वैसी भरनी' की ओर संकेत कर रहे हैं । आशय यहीं निकलता है कि जैसा कर्म हम कल (पीछे के दिनों में)करंगे, उसका परिणाम हमें आज और कल (वर्तमान तथा भविष्य) भुगतना पड़ेगा ।
चित्रकूट जाने के पूर्व विंध्यपर्वत पर आए- राजस्थान के अरावली से महाराष्ट्र के नागपुर तक फैले विंध्यपर्वत श्रृंखला के विविध अंचलों का श्रीराम ने भ्रमण किया था । गुरु अगस्त्य के दर्शन के लिए काशी को स्पर्श करने वाले हिस्सों (वर्तमान में चन्दौली) में गुरु का आश्रम था । वर्तमान मीरजापुर भी काशी खण्ड के अंतर्गत स्थान प्राप्त करता हैं । लिहाजा इस पर्वत अंचल में अपने पिता के गुरु वशिष्ठ के भाई अगस्त्य ऋषि से श्रीराम ने आशीर्वाद लिया था। गुरु ने उन्हें राक्षस वध के लिए उपयोगी शस्त्र भी दिए जो स्वर्ण निर्मित थे ।
गुरु अगस्त्य के श्लोकों से एडिसन ने बिजली बनाई- बिजली के आविष्कारक एडिसन ने ऑटो बायोग्राफी में खुद उल्लेख किया है कि संस्कृत के श्लोकों स्वप्न में गूंजे और उसी प्रेरणा से उन्होंने बिजली बनाई ।
ऊर्जा विस्तार के गुरु थे ऋषि अगस्त- विंध्य पर्वत ने जब सूर्य का मार्ग अवरुद्ध कर दिया तथा पृथ्वी पर अंधकार छा गया तब देवताओं के कहने पर गुरु अगस्त्य आए और पुनः जगत प्रकाशित हुआ ।
अगस्त्य नाम का महत्त्व- 'अग' शब्द का अर्थ अहंकार और पर्वत होता है । अहंकार को जो अस्त यानी समाप्त कर दे, वही अगस्त्य हो सकता है । अहंकार रूपी अंधकार का हनन 'ज्ञान' से ही होता है । वे *ज्ञान का समुद्र* पी गए थे । ज्ञानी ही असंभव को सम्भव कर पाता है ।
विंध्य का अहंकार- देवताओं द्वारा सुमेरु पर्वत के आगे अपनी उपेक्षा से विंध्य पर्वत क्षुब्ध रहता था। समाज में उपेक्षित व्यक्ति प्रायः आक्रोश में रहता है । 'विध' धातु से विन्ध्य शब्द बना है। जिसका काम वेध देना होता है लेकिन गुरु के चरण स्पर्श और झुक रहने की आज्ञा का विनम्र भाव से पालन करने से वह पावन बना तथा महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती के भी चरण इस पर्वत पर पड़े जिससे विंध्य पावन धाम बन गया ।
नारी सुरक्षा का संदेश- सीता के साथ प्रयागराज से आगे चित्रकूट की ओर बढ़ने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा-'नारी कहीं रहे । सजन (समाज) अथवा निर्जन में, उसकी रक्षा करने वाले का जीवन यशस्वी होता है ।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
©कॉपीराइट ऐक्ट का उल्लंघन दण्डनीय है ।
---मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को अयोध्या से वन जाते समय प्रयागराज में भरद्वाज ऋषि के आश्रम में पहुंचने के पूर्व माँ कौशल्या की याद आती हैं । जननी के प्रेम को याद करते हैं । मां का हृदय पुत्र के लिए कितना विराट होता है, इसे सोचकर उन्हें सुमित्रा की याद आती हैं तो वे और अधिक बेचैन होते हैं कि जो पीड़ा उनकी मां कौशल्या झेल रही होंगी, वह पीड़ा लक्ष्मण की मां को न हो । इसलिए वे लक्ष्मण से अयोध्या लौट जाने के लिए कहते हैं ।
वाल्मीकि रामायण
- किसी मां के मनोविज्ञान को वाल्मीकिजी ने अयोध्याकांड के 53वें सर्ग में इसका उल्लेख किया है । 21 श्लोकों में पुत्र का मां के प्रति दायित्व संबंधित कारुणिक वर्णन मिलता है । श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं-'मेरी माता ने चिरकाल तक स्वयं दुःख सहकर मेरा पालन पोषण किया । अब जब पुत्र से सुख रूपी फल पाने का अवसर आया तब मैंने मां को अपने से विलग कर दिया । मुझे धिक्कार है ।
सन्देश- श्रीराम का यह कथन आधुनिक सन्दर्भों में इसलिए उचित है कि प्रायः पुत्र के दायित्व निर्वाह की घड़ी जब आती है तब पुत्र यदि मां की उपेक्षा करता है, वह अत्यंत निंदनीय है ।
नारियों के लिए सन्देश- श्रीराम के अनुसार-'लगता है कि मेरी माँ ने पूर्व जन्म में कुछ माताओं को उनके पुत्रों से विलग किया था, इसलिए उन्हें यह कष्ट देखना पड़ रहा है ।' इस कथन के माध्यम से श्रीराम 'जैसी करनी वैसी भरनी' की ओर संकेत कर रहे हैं । आशय यहीं निकलता है कि जैसा कर्म हम कल (पीछे के दिनों में)करंगे, उसका परिणाम हमें आज और कल (वर्तमान तथा भविष्य) भुगतना पड़ेगा ।
चित्रकूट जाने के पूर्व विंध्यपर्वत पर आए- राजस्थान के अरावली से महाराष्ट्र के नागपुर तक फैले विंध्यपर्वत श्रृंखला के विविध अंचलों का श्रीराम ने भ्रमण किया था । गुरु अगस्त्य के दर्शन के लिए काशी को स्पर्श करने वाले हिस्सों (वर्तमान में चन्दौली) में गुरु का आश्रम था । वर्तमान मीरजापुर भी काशी खण्ड के अंतर्गत स्थान प्राप्त करता हैं । लिहाजा इस पर्वत अंचल में अपने पिता के गुरु वशिष्ठ के भाई अगस्त्य ऋषि से श्रीराम ने आशीर्वाद लिया था। गुरु ने उन्हें राक्षस वध के लिए उपयोगी शस्त्र भी दिए जो स्वर्ण निर्मित थे ।
गुरु अगस्त्य के श्लोकों से एडिसन ने बिजली बनाई- बिजली के आविष्कारक एडिसन ने ऑटो बायोग्राफी में खुद उल्लेख किया है कि संस्कृत के श्लोकों स्वप्न में गूंजे और उसी प्रेरणा से उन्होंने बिजली बनाई ।
ऊर्जा विस्तार के गुरु थे ऋषि अगस्त- विंध्य पर्वत ने जब सूर्य का मार्ग अवरुद्ध कर दिया तथा पृथ्वी पर अंधकार छा गया तब देवताओं के कहने पर गुरु अगस्त्य आए और पुनः जगत प्रकाशित हुआ ।
अगस्त्य नाम का महत्त्व- 'अग' शब्द का अर्थ अहंकार और पर्वत होता है । अहंकार को जो अस्त यानी समाप्त कर दे, वही अगस्त्य हो सकता है । अहंकार रूपी अंधकार का हनन 'ज्ञान' से ही होता है । वे *ज्ञान का समुद्र* पी गए थे । ज्ञानी ही असंभव को सम्भव कर पाता है ।
विंध्य का अहंकार- देवताओं द्वारा सुमेरु पर्वत के आगे अपनी उपेक्षा से विंध्य पर्वत क्षुब्ध रहता था। समाज में उपेक्षित व्यक्ति प्रायः आक्रोश में रहता है । 'विध' धातु से विन्ध्य शब्द बना है। जिसका काम वेध देना होता है लेकिन गुरु के चरण स्पर्श और झुक रहने की आज्ञा का विनम्र भाव से पालन करने से वह पावन बना तथा महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती के भी चरण इस पर्वत पर पड़े जिससे विंध्य पावन धाम बन गया ।
नारी सुरक्षा का संदेश- सीता के साथ प्रयागराज से आगे चित्रकूट की ओर बढ़ने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा-'नारी कहीं रहे । सजन (समाज) अथवा निर्जन में, उसकी रक्षा करने वाले का जीवन यशस्वी होता है ।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
©कॉपीराइट ऐक्ट का उल्लंघन दण्डनीय है ।


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