कोरोना ओढ़ता हूं, कोरोना बिछाता हूँ, इसलिए कोरोना-गाथा सबको सुनाता हूं

मिर्जापुर। हिंदी के मशहूर ग़ज़लकार दुष्यंत ने *जो ओढ़ता बिछाता हूं, वही ग़ज़लें सुनाता हूं* से अपना मन्तव्य साफ कर दिया कि परिवेश से मुक्ति नहीं मिल सकती । इन दिनों किसी भी लेविल पर देखिए तो कोरोना ही कोरोना का बोलबाला है । 'आला' से लेकर 'आम' तक, 'गोरा' से लेकर 'काला' तक,, 'साहब' से लेकर 'लाला'। तक कोरोना गाथा सुन-सुना रहे हैं । न्यूज से लेकर ब्यूज तक को संग्रहित कर दिया जाए तो कोरोना चरित महाग्रन्थ बन जाए ।
चट हुआ खेत-खलिहान : रो रहा किसान - कोरोना तो लम्पट आशिक की तरह यहां-वहां नहीं देख रहा लेकिन 'माधुरी दीक्षित के फंसी गोरी चने के खेत मे से दो कदम आगे बढ़कर  गोरी नहीं पूरे खेत को ही लपेट में लिए है । पकी फसल की हालत नवविवाहिता को छोड़ बेरहम सैंया सौतन के घर डेरा डालने जैसा कांड कर रहा है । तिस पर कोढ़ में खाज यह है कि सदियों से रूठी प्रकृति आंधी-तूफ़ान, बादल-वर्षा, ओला-पत्थर, बिजली की कड़क-चमक वाली सेना लेकर लॉकडाउन युग में पूरी तरह ओपेन हमला किए हुए है ।
आज का पॉजिटिव खबर क्या है- इस 'पॉजिटिव' शब्द की बड़ी तरफदारी होती रही है । उपेक्षित निगेटिव ने कोई बड़ी तपस्या की और वरदान पाकर पॉजिटिव की ऐसी-तैसी, जैसी कभी नहीं वाली हालत कर दी है । हर समय कोरोना के शैडो बन आगे पीछे घूम रहे लोगों का टेलीफोन जी का जंजाल बना हुआ है । घण्टी बजी, आवाज में कोई दुआ-सलाम नहीं बस एक सवाल- 
आज की पॉजिटिव खबर क्या है ? शुरुआत के कुछ दिन तो ठीक लगे, पर अब  यह सवाल 'प्रथम ग्रासे मच्छिका भक्ष (पहले ही कौर में मक्खी)  जैसा हो गया है ।
                        सलिल पांडेय, मिर्जापुर
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