कालसर्प-दोष: यह है क्या ?

नागपंचमी पर्व पर कालसर्पदोष निवारण का विधान बताया गया।
यह है क्या ?- इस पर गौर करने पर 3 शब्दों से ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है।
1-काल, 2-सर्प और 3 दोष
काल का मतलब समय और सर्प का मतलब नकारात्मकता । जिसके मन और मस्तिष्क में अहंकार, क्रोध, वासना, निंदा, द्वेष, ईर्ष्या, छलछद्म, धोखा आदि सर्प-सर्पिणियाँ विद्यमान हैं और दोष का मतलब जब बीते समय को सर्पों के हवाले कर दिया गया तो वह दोष वर्तमान को डंस रहा है।
निवारण- धन के बल पर यज्ञ-अनुष्ठान से नहीं मिलेगी मुक्ति । इसके लिए बीते दिनों में की गई गलतियों के लिए पश्चाताप-यज्ञ का विधान है। इसमें अपनी गलतियों को खुद ही उद्धाटित करने तथा फिर से ऐसी गलती न करने और दृढ़तम संकल्प लेने का मन बनाना चाहिए। घर तथा समाज के बड़े-बुजुर्गों का अनादर, अपमान किया तो उनसे जाकर माफी मांगने तथा आगे से आदर करने का भी मन बनाना यज्ञ-अनुष्ठान ही है।
सर्वाधिक अपमान- प्रायः अधिकांश लोग माता-पिता का सर्वाधिक अपमान इसलिए करते हैं क्योंकि माता-पिता अपमान का जहर पीकर चुप हो जाते हैं । बचपन में माता-पिता को देवता मानने वाला व्यक्ति विवाहोपरांत सास-श्वसुर को देवता मानने लगता है और महिलाएं अपने सास-श्वसुर को फूंटी आंखों नहीं देखना चाहती जबकि अपने माता-पिता की सेवा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती।
यह दोमुंहे सांप-सी प्रवृत्ति है।
  अकारण किसी मेधावी, सफल, उद्यमता के बल पर आगे बढ़ने वाले से ईर्ष्या करना सर्पिणी-भाव है।
   खुद के साथ अच्छे बर्ताव की अपेक्षा और दूसरों के साथ कुत्सित काम करना कालिया नाग है जबकि लुक-छिप कर किसी को कांटते रहना तक्षक सर्प की प्रवृत्ति है। जिसने छिप कर परीक्षित को काट कर मारा था।

इन प्रवृत्तियों से बचने का पर्व है नागपंचमी। इस तरह के अनुष्ठान से ही बच सकेगा कोई भी व्यक्ति कालसर्प दोष से न कि अन्य किसी उपाय से।
                              © सलिल पांडेय, मिर्जापुर

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