"नियति घोष" (रचयिता कमल बाजपेई)

जब किया पुरुषार्थ इच्छित फल नहीं पाता,

राग हो सुंदर सुरीला गा नहीं पाता,

अर्थ हो पर्याप्त मानव खा नहीं पाता,

तब परम सत्ता प्रबल है ज्ञान हो जाता ।

चाह मानव की जहाँ पर चल नहीं पाती,

ज्ञान की बाती अजर है बुझ नहीं पाती,

जो पुराने रास्ते चलना हुआ दुष्कर हमारा,

तब हमें गन्तव्य के पथ का दिया उसने सहारा ।

है नया पथ मान लो चलना उसी में ही पड़ेगा,

रास्ते सुंदर बनेंगे कर्म पथ छोटा पड़ेगा,

ज्ञान अरु विज्ञान का लेकर सहारा हम बढ़े,

है नियति का घोष यह उसको सुने, समझे, पढ़े ।

रचयित ~ कमल बाजपेयी

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