पंचायत चुनाव: भाजपा के हर पैंतरे को दी मात, यादव बाहुबली जिलों में सधी चाल से सपा ने बचाया गढ़

◆यादव बहुल जिलों मैनपुरी, इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद और कन्नौज में सपा सधी चाल चलकर गढ़ बचाने में कामयाब रही। भाजपा की पैंतरेबाजी को मात देने के लिए इटावा में सपा व प्रसपा ने 10 सीटों पर साझा उम्मीदवार उतारे। 


पंचायत चुनाव की फोटो
रजनीकांत अवस्थी

लखनऊ: यादव बहुल जिलों मैनपुरी, इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद और कन्नौज में सपा सधी चाल चलकर गढ़ बचाने में कामयाब रही। भाजपा की पैंतरेबाजी को मात देने के लिए इटावा में सपा व प्रसपा ने 10 सीटों पर साझा उम्मीदवार उतारे तो इस क्षेत्र की कई सीटें रिक्त घोषित कर वहां पार्टी के ही दो से तीन उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया। इन पांचों जिलों में पुख्ता रणनीति की बदौलत करीब 70 फीसदी सीट पर सपा अथवा उनके समर्थक चुनाव जीतने में कामयाब रहे। वहीं, कुछ सीटों पर देर रात तक सपा बढ़त बनाए रही।

     आपको बता दें कि, भाजपा ने इस क्षेत्र में जीत दर्ज कर पूरे प्रदेश में नया संदेश देने की तैयारी में थी। इसके लिए लगातार अभियान चलाए गए और सपा से नाराज लोगों पर दांव लगाया गया। इसी रणनीति के तहत मैनपुरी में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की भतीजी और निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष संध्या यादव को भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा था, लेकिन सपा प्रत्याशी के सामने उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। यहां की 30 सीटों में देर रात तक करीब 15 सीट पर सपा अथवा उनके समर्थक विजेता रहे। अन्य सीटों पर निर्दलीय अथवा भाजपा जीत के करीब थी। शिवपाल के करीबी सुजान सिंह निर्दलीय तो उनके बेटे और बहू सपा उम्मीदवार के तौर पर जीते हैं।  

     इटावा की 24 सीटों में से करीब 20 सीधे तौर पर सपा को मिलीं हैं। इसमें 10 सीट पर सपा और प्रसपा ने साझा उम्मीदवार उतारे थे। पूर्व सीएम अखिलेश यादव के चचेरे भाई और निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष अभिषेक यादव विजयी रहे। औरैया में भाजपा के कब्जे वाली जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी हिलाने के लिए सपा ने पुख्ता रणनीति बनाई और चुनाव में 30 में से करीब 12 सीटें झटकने में कामयाब रही। 5 सीटों पर निर्दलियों ने बाजी मारी है, जो किसी न किसी रूप से सपा से ही जुड़े बताए जा रहे हैं।  

     टिकट बंटवारे के दौरान सपा को सबसे ज्यादा फजीहत कन्नौज में झेलनी पड़ी थी। यहां तीन बार सूची बदली गई और चौथी बार कई सीटें रिक्त घोषित की गईं, लेकिन चुनाव परिणाम सपा के ही पक्ष में नजर आया। देर शाम तक 28 सीटों में 25 पर सपा उम्मीदवार अथवा पार्टी से जुड़े वरिष्ठ नेता बढ़त बनाए रहे। हालांकि निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष शिल्पी संजीव इस बार चुनाव मैदान में नहीं थी। फर्रुखाबाद में जबरदस्त मुकाबले के बीच पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह यादव अपनी बेटी व परिवार के अन्य दो सदस्यों को जिताने में कामयाब रहे। यहां नरेंद्र के कभी दाहिने हाथ माने जाने वाले दृगपाल सिंह बॉबी की भाभी रीता यादव पर भाजपा ने दांव लगाया था, लेकिन देर शाम तक वे काफी पीछे नजर आईं।  

    सपा के लिए क्यों खास हैं ये जिले : सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के परिवार की जड़ें इन जिलों में फैली हैं। मुलायम के परिवार की ज्यादातर रिश्तेदारी इन्हीं जिलों में हैं। हालांकि चाचा-भतीजे की जंग का असर भी यहां दिखता है। ऐसी स्थिति में भाजपा इस इलाके में कमल खिलाने के लिए बेताब रही है। गढ़ को खत्म करने के लिए संघ ने विधिवत होमवर्क किया तो भाजपा ने सियासी गोटियां बिछाई। इसके लिए सपा से टिकट न पाने वालों को भाजपा समर्थित उम्मीदवार घोषित किया गया। इसके बाद भी हर दांव फेल रहा। भाजपा के मंसूबों को भांपते हुए सपा ने नई रणनीति अपनाई। जिन सीटों पर ज्यादा विवाद था उसे रिक्त घोषित कर दिया। ऐसे में संबंधित सीट पर पार्टी के दो से तीन उम्मीदवार मैदान में उतरे और जीत के बाद उनका सपा के खेमे में रहना स्वाभाविक है।  

  सैफई प्रथम पर थीं निगाहें : इटावा की सैफई प्रथम सीट पर प्रदेश की निगाहें थी। इटावा में एक तरफ 10 सीट पर सपा-प्रसपा ने साझा उम्मीदवार उतारे थे तो सैफई प्रथम पर शिवपाल सिंह यादव के करीबी डॉ अरविंद यादव के सामने सपा ने प्रेम सिंह यादव को मैदान में उतारा था। आखिरकार डॉ अरविंद विजेता रहे।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ