मऊ प्रधानी चुनाव का रिजल्ट: बिखर गया भानुमति का कुनबा।। Raebareli news ।।

 ◆70 चूहे मिलकर भी नहीं बांध सके एक बिल्ली के गले में घंटी।

◆आने वाले 20 वर्षों तक नहीं है सत्येंद्र सिंह का कोई विकल्प।


रजनीकांत अवस्थी

महराजगंज/रायबरेली: क्षेत्र के सबसे चर्चित ग्राम पंचायत मऊ गर्बी में मतगणना के बाद जो परिणाम उभर कर सामने आए हैं, उससे यह साबित हो गया है कि, जो काम करेगा, वही जीतेगा। थोथी बयान बाजी और वोटरों को छलावा देकर वोट हासिल करना अब संभव नहीं है। मऊ के चुनाव ने एक बात और साबित कर दी है कि, चूहे चाहे जितने मोटे और बड़ी तादाद में हो, एक बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकते। मतगणना के बाद अब स्वाभाविक तौर से पराजित खेमे में अंतरकलह सामने आ रहा है, जबकि लोग अपने ही खेमे के लोगों पर शक और सुबहा की तलवारें भांज रहे हैं। इस मतगणना के बाद मऊ गांव के रहने वाले पूर्व ब्लाक प्रमुख सत्येंद्र प्रताप सिंह ने यह साबित कर दिया है कि, फिलहाल वह अजेय हैं।

    आपको बता दें कि, मऊ में इस बार प्रधानी की सीट अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित हो गई थी। निवर्तमान ग्राम प्रधान नीलम सिंह जिन्होंने अपने 5 वर्ष के कार्यकाल में विकास कार्यों की झड़ी लगाकर मऊ गर्बी ग्राम सभा को एक नया स्वरूप दे दिया था, और चर्चा हो रही थी कि, सीट अनारक्षित हुई, तो नीलम सिंह का मुकाबला नहीं किया जा सकता। लेकिन चुनाव आयोग द्वारा इस सीट को अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित कर दिए जाने के बाद यह तय हो गया कि, नीलम सिंह चुनाव नहीं लड़ सकती, तो फिर क्या था विपक्षी खेमे में अचानक हलचल बढ़ गई। लोगों ने प्रधान पद पर ब्लाक प्रमुख सत्येंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ चक्रव्यूह की रचना रचने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

    हालांकि ब्लाक प्रमुख सत्येंद्र प्रताप सिंह गांव के एक बेहद सरल एवं मिलनसार युवा प्रत्याशी भेलई मौर्य को प्रधानी में खड़ा करके अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। इस पर प्रमुख विरोधी सभी ताकतें एक मंच पर आ गई, और उन्होंने प्रमुख समर्थित प्रत्याशी भेलई मौर्य के विरुद्ध वासुदेव यादव को चुनाव में उतार कर प्रण कर लिया कि, इस बार साम दाम दंड भेद से भेलई मौर्या को हराकर प्रमुख के मंसूबों पर पानी फेर कर ही रहेंगे।

   रात दिन रणनीतियां बनने लगी नए-नए शगल रचे गए, और विपक्षी खेमे द्वारा आक्रामक ढंग से प्रचार प्रसार शुरू कर दिया गया। एक बार तो लगा कि, इस बार 70 चूहे मिलकर बिल्ली के गले में घंटी बांध ही लेंगे। लेकिन जैसे जैसे चुनाव प्रचार का सिलसिला आगे बढ़ता रहा, विपक्षी खेमे में फूट पड़ने लगी। एक-एक करके कई महत्वपूर्ण लोग या तो किनारे होकर बैठ गए, अथवा गुपचुप तरीके से भेलई मौर्य के पक्ष में अंदरूनी प्रचार करने लगे, उन्हीं में कुछ लोग ऐसे भी थे जो भेलई मौर्य के प्रचार का खुलकर कर नेतृत्व भी कर रहे थे। 

    मतदान के दिन तक बावजूद इसके प्रमुख विरोधी खेमे की अगुवाई कर रहे नेता यह मानने को तैयार नहीं थे कि, इस बार उनकी हार होगी, और मतदान के दिन अधिक से अधिक मतदान कराने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा दिया। मतदान समाप्त होने के बाद भी विरोधी खेमे के धुरंधरों के दावे दिन प्रतिदिन बहुत मजबूत दिखे, लेकिन जब एन वक्त पर मतगणना शुरू हुई, तो पहले राउंड से ही विपक्षी खेमे की रणनीति का खुलासा होने लगा। हर चक्र में लगातार भेलई मौर्य बढ़त बनाए हुए थे, तो वहीं दूसरी ओर वासुदेव यादव के पिछड़ने का क्रम उत्तरोत्तर जारी रहा, और देखते ही देखते भेलई मौर्य को रिकॉर्ड 2129 मत मिले, जबकि वासुदेव को महज 935 मतों तक ही सिमट कर रह जाना पड़ा।

    हर कोई मतगणना के बाद चर्चा कर रहा है कि, ब्लाक प्रमुख सत्येंद्र सिंह ने अपने कार्यकाल में जिस प्रकार मऊ का सर्वागीण विकास किया है, समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुंची है। रिकॉर्ड संख्या में शौचालय और प्रधानमंत्री आवास का आवंटन हुआ है। गांव गलियारों को इंटरलॉकिंग के द्वारा चमका दिया गया है। गांव का हर व्यक्ति चंद लोगों को छोड़कर ब्लाक प्रमुख सतेंद्र सिंह की दरियादिली और सेवा भाव की राजनीति का कायल हो चुका है। ऐसे में परंपरागत विरोधी चाहे जितना जोर लगा ले, मऊ की जनता पर तो सत्येंद्र सिंह का जादू इस चुनाव में ही नहीं, आने वाले हर चुनाव में सिर पर चढ़कर बोलेगा। हताश निराश विरोधी खेमा फिलहाल, तो इस करारी हार को पचा नहीं पा रहा है। लेकिन सत्य तो सत्य है। एक दिन उनको भी यह बात स्वीकारनी हीं पड़ेगी। अब गांव सभा के अधिकांश लोगों का कहना है कि, सौ चूहे मिलकर भी एक बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकते, साथ ही एक कहावत भी चरितार्थ हुई है कि, "कहीं का ईद कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा" और भानुमति का यह कुनबा बिखर कर रेत की महल की तरह ढह गया है।

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