गंगा के घाट पर रेत में दफनाए गए शवों नोचते कुत्ते।
रजनीकांत अवस्थीरायबरेली: गंगा की रेत में बिछी लाशों का भयावह मंजर देख, आस-पास के गांवों के लोग खौफजदा है। इन श्मशान घाटों की भयावह तस्वीर देख किसी की भी रूह कांप जाए। हर तरफ गंगाघाटों पर बालू के ऊंचे-ऊंचे ढेर दिख रहे हैं। इनमें शव दफन हैं। दूर-दूर तक बांस की टिट्टी, चादरें और अंतिम संस्कार में उपयोग होने वाला सामान नजर आ रहा है।
आपको बता दें कि, बालू के ढेर के नीचे दबे कई शवों का कुछ हिस्सा बाहर भी निकल आया है। घाट पर अजीब सी खामोशी है। दुर्गंध भी आती है। शवों की बे-कदरी देख आसपास के गांव के लोग भी हैरत में हैं, पर प्रशासन अंजान बना हुआ है। कोरोना काल में मृतकों का आंकड़ा अचानक बढ़ने से दाह संस्कार के लिए घंटों इंतजार करने की बजाए लोग अपनों को मजबूरी में गंगाघाट किनारे बालू में ही दफन करने को विवश हैं। कोरोना के कहर के चलते गंगाघाटों पर शवों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। लोगों को अंतिम संस्कार के लिए घंटों पर इंतजार करना पड़ रहा है। मजबूरी में कई लोग अपनों को बालू के नीचे दफन कर रहे हैं। जिन श्मशान घाटों पर एक दिन में कभी पांच से 12 शव पहुंचते थे, वहां इस समय इनकी संख्या दोगुनी से ज्यादा हो गई है। इस वजह से कभी लकड़ी की कमी तो कभी दाह संस्कार के लिए अन्य चीजों में होने वाली लेटलतीफी से बचने के लिए लोग शवों को बालू में दफन कर रहे हैं।
ग्रामीणों की मानें तो कई बिरादरी में शादी से पहले किसी के खत्म होने पर उनके शवों को जमीन में दफन करने की परंपरा है। इस वजह से भी लोग बालू में शव दफन कर रहे हैं। वहीं लकड़ी की कमी तथा आर्थिक तंगी भी इसकी एक बड़ी वजह है। उधर, सोशल मीडिया पर यहां की भयावह तस्वीर वायरल हो रही है। इससे अफसरों में हड़कंप मचा। अफसर इसकी सच्चाई जानने के लिए स्वयं घाटों का जायजा लेते हुए दावा कर रहे हैं कि, लोग अपने मनमर्जी से शवों को दफनाने और चिताएं जलाने का काम कर रहे हैं। फिलहाल जिस तरह की तस्वीर श्मशान घाटों की है, उससे लोगों का मन विचलित हो रहा है।
लालगंज और डलमऊ तहसील के बार्डर पर चिलौला गांव के पास गंगा किनारे के श्मशान घाट की तस्वीर ने सभी को चौंका दिया है। यहां पर मिट्टी में शव दफनाएं दिख रहे हैं। बांस व कपड़े बिखरे पड़े हैं। आपको यह भी बता दें हैं कि, हर दिन इस घाट पर 15 से ज्यादा शव पहुंच रहे हैं। इसमें से अधिकतर लोग शवों को दफनाने का काम कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि, शव जलाने के लिए लकड़ी नहीं मिल पा रही है। इससे लोग मजबूर होकर शवों को दफना रहे हैं। पैसों की कमी भी इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है। वहीं कुछ बिरादरी में शादी से पहले मृत्यु होने पर भी शव को दफन करने की परंपरा है। इसके अलावा ऊंचाहार क्षेत्र में गंगा नदी के गोकना घाट, खरौली घाट, गोलाघाट व बादशाहपुर आदि घाटों पर शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। इसमें गोकना घाट पर दक्षिण वाहिनी गंगा होने की वजह यहां अंतिम संस्कार का अलग महत्व है।
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान इन घाटों पर शवों के आने का सिलसिला अचानक बढ़ गया था। प्रतिदिन 40 से 45 शव घाटों पर आ रहे थे। लोग शवों को जलाने के बजाय दफना रहे थे। हालांकि इधर, शवों के आने की संख्या कम हुई। गोकना गंगा घाट के तीर्थ पुरोहित शैलेंद्र द्विवेदी, भूपेंद्र व शिव बचन मिश्रा ने बताया कि, एक सप्ताह से शवों के अंतिम संस्कार में कमी आई है। इसके पहले प्रतिदिन इन घाटों पर लगभग पचास शवों का अंतिम संस्कार हो रहा था। स्थानीय लोगों ने बताया कि, आसपास के गांवों में काफी लोग मर रहे हैं। मन बहुत विचलित हो गया है।
जबकि सरेनी सरेनी क्षेत्र के गेगासो गंगाघाट पर दफनाए गए शवों को कुत्ते नोंच रहे हैं। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इस पर हड़कंप मच गया था। उपजिलाधिकारी विनय कुमार मिश्र ने गेगासो श्मशान घाट का जायजा लिया। उन्होंने बताया कि, श्मशान घाट के निरीक्षण के लिए एक संयुक्त टीम गठित की गई है। जांच के बाद उन्होंने कहा कि, शिकायत थी कि, शवों को कुत्ते नोचने की बात गलत पाई गई है। जो व्यक्ति परंपरागत तरीके से शव को दफनाना चाहता है, उसे रोका नहीं जा सकता। उन्होंने ग्राम प्रधान देशराज यादव से कहा कि, श्मशान घाट की सफाई शीघ्र करा दें और जेसीबी से गड्ढा खोदवाकर उसमें पानी की बोतलें प्लास्टिक कपड़े गंदगी दबा दें। उन्होंने घाट पर कर्मकांड कराने वाले पंडितों से कहा कि, यदि किसी के पास लकड़ी की समस्या है, तो ग्राम प्रधान को सूचित करें। लकड़ी मुहैया कराई जाएगी। इस मौके पर सीओ लालगंज डॉ0 अंजनी कुमार चतुर्वेदी, तहसीलदार रिचा सिंह, कोतवाल अनिल सिंह मौजूद रहे।

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