सार.......
⭕ अधिकारियों और कर्मचारियों में भाजपा के प्रति नाराजगी भी एक बड़ा कारण उभर सामने आया है।
⭕ अपनों की नाराजगी और अखिलेश-राहुल की केमिस्ट्री ने ढहाया उप्र में भाजपा का किला।
⭕ जिस वाराणसी सीट से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद मैदान में थे, उसे आसपास की सीटों में भाजप-राजग प्रत्याशी चुनावी रण में जूझते नजर आए।
विस्तार..........
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
रायबरेली: देश में सर्वाधिक लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश के जो नतीजे सामने आए हैं, वह भाजपा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। हिंदी पट्टी, राज्य में भाजपा की सरकार, जनवरी में अयोध्या में भव्य मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा और योगी आदित्यनाथ जैसा फायर ब्रांड स्टार प्रचारक। इन सबके बावजूद अखिलेश-राहुल की जोड़ी ने जो करिश्मा कर दिखाया, उसका सेहरा सिर्फ उनके सिर में ही बांधना उचित नहीं होगा। आज जो यूपी में भाजपा का हश्र हुआ है, उसके लिए भाजपा उतनी ही जिम्मेदार है।
आपको बता दें कि, उत्तर प्रदेश में अधिकारियों से लेकर जनता तक में भाजपा के प्रति नाराजगी भी बड़ा कारण है। वहीं, भाजपा कार्यकर्ताओं में वह उत्साह नहीं दिखा जो पिछले चुनावों में देखने को मिलता था। कहीं न कहीं उनमें नाराजगी दिखी। पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं ने भी जिस तरह लोकसभा चुनाव में सक्रियता दिखानी चाहिए, वह नहीं दिखाई। उत्तर प्रदेश में भी कई सीटों पर प्रत्याशियों के चयन में स्थानीयता और कार्यकर्ताओं को बहुत महत्व नहीं दिया गया। जिससे कार्यकर्ता बिचके-बिचके दिखे। तीन दशक से भाजपा चुनावी मैनेजमेंट को लेकर हमेशा चर्चा में रहती थी। इस के चुनाव में वह मैनेजमेंट जमीनी स्तर पर देखने को नहीं मिला। सिर्फ सोशल मीडिया और वाट्सएप युनिवर्सिटी में भाजपा के पक्ष में आक्रामक मैसेज दिए जा रहे थे, जो कहीं न कहीं उल्टे भी पड़े।
वहीं, कहीं न कहीं अधिकारियों और कर्मचारियों में भाजपा के प्रति नाराजगी भी एक बड़ा कारण उभर सामने आया है, जिसने भाजपा को इस चुनाव में इतना बड़ा डेंट दिया है। यह कहना अति नहीं होगी कि, उत्तर प्रदेश में इस बार भाजपा चुनावी रणनीति में फेल रही। चुनाव में यह भी चर्चा में रही कि, भाजपा ने जातीय समीकरणों का बहुत ध्यान नहीं रखा। कई चुनावी पंडितों ने इसको लेकर आशंका जताई थी कि, इसका असर चुनाव परिणामों में दिखेगा। वैसा ही हुआ भी। भाजपा का जो अबकी बार 400 पार का नारा था, उसमें उत्तर प्रदेश से 80 में कम से कम 65 सीटों की उम्मीद की जा रही थी।
भाजपा नेतृत्व भी इसको लेकर आशांवित दिख रहा था, लेकिन जनादेश ने सभी आशाओं को धराशाई कर दिया। उत्तर प्रदेश के जो चुनावी नतीजे दिख रहे हैं, उससे साफ है कि, यहां मोदी योगी मैजिक नहीं चला। यहां चली तो सिर्फ और सिर्फ जनता की मनमर्जी।
उधर, विपक्ष ने भाजपा में जो-जो कमियां की थीं, उन्हीं पर खुद को मजबूत कर हल्लाबोल की तरह चुनाव में कूदा। मध्यप्रदेश, राजस्थान सहित पांच राज्यों में हाल में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों से सबक लेकर राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति बदली। अखिलेश यादव ने टिकट बंटवारे में सीटवार जातीय समीकरणों का खूब ध्यान रखा और उसी का परिणाम है कि, इस चुनाव में इंडी गठबंधन को बड़ी और अप्रत्याशित सफलता मिली।
यह कहना गलत नहीं होगा कि, अखिलेश ने उत्तर प्रदेश में जो चुनावी रथ की कमान संभाली वह भाजपा की सतही चुनावी रणनीति को रौंदने में सफल रही। गौर करने वाली बात यह भी है कि, कांग्रेस की गारंटियों को अखिलेश ने इस चुनाव में खूब भुनाया। अखिलेश इस सोच से बाहर रहे कि, कांग्रेस की बातों को अगर मैं बोलूंगा तो मेरी पार्टी को क्या नफा-नुकसान होगा। उन्होंने जिस तरह एक गठबंधन को चुनाव में लडऩा चाहिए, उसका बखूबी ध्यान रखा और चुनाव में उसका भरपूर फायदा लिया। महिलाओं के खाते में खटाखट साढ़े आठ हजार, तीस लाख लोगों को फटाफट नौकरी जैसी कांग्रेस की गारंटी को अखिलेश ने हर चुनावी सभा में खूब भुनाया। अखिलेश ने चुनाव में यह भांप लिया था कि, बड़ा वर्ग है जो भाजपा से नाखुश है। उसे कैसे अपने पक्ष में किया जाए, यह अखिलेश यादव करने में सफल रहे। उत्तर प्रदेश के चुनाव में कहीं न कहीं कांग्रेस की रणनीति भी बेजोड़ रही। राहुल के साथ प्रियंका ने भी चुनाव में खूब पसीना बहाया। प्रियंका अपने भाषणों में आक्रामक रहीं और भाजपा पर सीधे तौर पर हमलावर रहीं।
राहुल ने कई बार अखिलेश के साथ मंच साझा किया। इससे साफ संकेत जनता के बीच गया कि, दोनों का गठबंधन मजबूत है। अमेठी जैसी सीट पर स्मृति ईरानी की हार, वह भी कांग्रेस के किशोरी लाल के हाथों यह बड़ी रणनीतिक जीत है। भाजपा बार-बार अमेठी से राहुल गांधी को मैदान में उतरने की चुनौती दे रही थी। कांग्रेस यहां भी उसकी रणनीति में नहीं फंसी तथा रायबरेली से राहुल मैदान में उतरे और मैदान फतेह किया। चिंता की बात है कि, जिस वाराणसी सीट से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद मैदान में थे, उसे आसपास की सीटों में भाजप-राजग प्रत्याशी चुनावी रण में जूझते नजर आए।

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